Thursday, September 29, 2016

दलित आन्दोलन

जन उदय : भारत में जातिवाद की समस्या हजारो साल से है और यह इसलिए है की ब्राह्मणों ने इस जातिवाद को सामाजिक बना दिया और यह कह दिया की यह भगवान् की बनाई हुई वाव्य्स्था है जिससे समाज को सुचारू रूप से चलाया जा सके . मानसिक रूप से विक्षिप्त ब्राह्मणवादी मैनेजमेंट गुरु यह भी बताने से नहीं हिचकते की भारत में मनेजमेंट हजारो सालो से है क्योकि प्राचीन भारत में समाज को चलाने के लिए एक वैज्ञानिक वाव्य्स्था थी , खैर ये वही लोग है नारद को पहला रिपोर्टर बताते है 

खैर यहाँ यह भी जान लेना भी आवश्यक है की भारत में ब्राह्मण विदेशी और यहाँ शरण ले कर रहे रहे थे , लेकिन अशोक के बाद उसके प्रोपोत्र का सेनापति पुष्य मित्र सुंग जिसने धोके से अपने सम्राट को मार बौध लोगो की हत्या करना शुरू कर दिया बौध विहार और मठ तोड़ उनको मंदिरों की शक्ल दे दी गई 
और बौध लोगो को अपना गुलाम बना लिया , इसी गुलामी को बरकारर रखने के लिए ब्राह्मणों ने मानव मनोविज्ञान का इस्तेमाल करते हुए कुछ ग्रन्थ रचे जिनमे अपने आपको श्रेष्ट बताया जाति वावय्स्था को समाजिक और धार्मिक मान्यता देने वाले ग्रन्थ रच लिए और दलितों को शिक्षा , सम्पति के अधिकार छीन लिए गए 

दलित आन्दोलन होते होते बाबा साहेब तक आये जिन्होंने न सिर्फ इस देश का सविंधान बनाया बल्कि दलितों को पुन पैक्ट के बदले आरक्षण भी दिलवाया जिसमे उम्मीद थी की दलितों की सामाजिक और आर्थिक स्थिथि सुधरेगी लेकिन ऐसा भी नहीं हो सका क्योकि दलितों के नाम पर मिले सारे फायदे खुद जातिवाद के जनक रक्षक और पोषक समाज ने खा लिए , लेकिन एक बहुत बढ़ा फर्क जो भारत के समाज में बाबा साहेब ने डाला वह यह था बाबा साहेब ने अपनी मृत्यु से पहले लाखो लोगो के साथ बौध धर्म अपनाया . 

हालांकि इसके बाद भी जातिवाद खत्म नहीं हुआ बल्कि पिछले कुछ सालो से जातिवाद लगातार बढ़ रहा है और इसके साथ साथ जाति के नाम पर उत्पीडन भी लेकिन इस बीच एक काम यह हो गया है की दलित समाज के काफी लोग पढ़ लिख गए है और ये पढ़े लिखे लोग अपने अपने समाज और परिवेश में काफी जागरूकता ला रहे है लेकिन इनकी संख्या काफी कम है क्योकि जो दलित पढ़ लिख गए है और समाज में काफी अच्छा मकाम हांसिल कर चुके है वो लोग खुद ब्राह्मणवादी हो चुके है और इन्ही की वजह से दलित समाज आगे नहीं जा पा रहा है . 

अभी कुछ दिन पहले मायावती ने ये ऐलान किया था की वो अपने समर्थको के साथ बौध धर्म स्वीकार करेंगी . 
अगर ऐसा होता है तो यह बात समझ लेनी चाहिए की मायावती के समर्थक लाखो में नहीं बल्कि करोडो में है और ये है भारत के इतिहास की एक बहुत बड़ी घटना होगी जो पूरी दुनिया के सामाजिक आंदोलनों पर बहुत गहरा असर डालेगी और भारत में तो सीधा सीधा ब्राह्मणवाद पर बहुत बढ़ा असर डालेगी , 

मायावती के इस कदम से हिन्दू नाम की प्रजाति एकदम लुप्त हो जाएगी और ब्राह्मणवादी जो लोग हिन्दू नाम का कवच पहन मुस्लिम और इसाइओ पर अत्याचार करते है वह सब इसके बाद न हो सकेगा , बल्कि बौध , मुस्लिम , इसाई मिलकर कर ब्रह्मन्वाडियो को इस देश से ही नेस्तनाबूत कर देंगे , किसी भी तरह का सामाजिक तनाव ब्राह्मणवादी झेल नहीं सकेंगे और इसके बाद यह तय है की इनका अंत बहुत जल्द ही हो जाएगा 

Wednesday, September 28, 2016

गंगा

गंगा, नाम लेते ही आँखों के आगे भगवान शिव के मस्तक से बहती, मकरवाहिनी, मंद मुस्कान के साथ धरती की तरफ सन्यासी बने भागीरथ के पीछे-पीछे चलती एक शुभ्र और मन को शीतलता प्रदान करने वाली देवी का चित्र आ जाता है। परंतु जब हम हरिद्वार में पहुँचते हैं तो सामने दिखती है एक विशाल जलराशि जो अपनी विशिष्ट गति के साथ बहती है उत्तर के हिमालय की ओर से। गंगा, जिसे हमारे शास्त्रों में पापमोचनी कहा गया है, पुराण बताते हैं कि, महाराज सगर के साठ हजार पुत्रों का उद्धार करने को गंगा उतरी थी धरा-धाम पर। सात पीढ़ियों तक अटूट तपस्या और कोशिशों के बाद जब गंगा पृथ्वी पर उतरने को तैयार हुई तो गंगा के वेग को झेलने के लिए भगवान शिव की जरूरत पड़ी और फिर भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया। ये वो कहानी है जो हमने सदियों से पढ़ी है, परंतु जब हम गंगा दर्शन के लिए हरिद्वार पहुँचते हैं और हरिद्वार से ऋषिकेश तक का सफर जब हम सड़क मार्ग से करते हैं तब पता चलता है कि ये जो कथाएँ हमे बताई जाती है वो सिर्फ पौराणिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक स्तर पर भी कुछ हद तक सही लगती है। विज्ञान का छात्र नहीं होने और एक साहित्य का छात्र होने के नाते मेरी कल्पना ही बता सकता हूँ, ये कोई वैज्ञानिक तर्क नहीं हो सकता, परंतु कल्पना तो हम कर ही सकते है। हरिद्वार से ऋषिकेश तक के राह में फैले विशाल जंगल को यदि हम गौर से देखें तो हमें लगेगा कि ये वाकई किसी शिव नाम के विशाल व्यक्ति के मस्तक पर लटकती जटाएँ ही है। यदि पुरातन काल के विज्ञान पर ध्यान दिया जाये तो ये कहा जाता है कि, गंगा के पानी के पदार्थ-विज्ञान में कोई विशिष्ट बदलाव कर दिया गया था जिससे उसके पानी में जीव नहीं पड़ते हैं। यदि हम इसे एक क्षण के लिए सच माने तो फिर लगता है कि ये वैज्ञानिक कोशिश सिर्फ भागीरथ ने ही नहीं की थी, बल्कि उनसे पहले उनके पूर्वजों ने भी कोशिश की थी और जिसका नतीजा था कि, भागीरथ आखिर में इसमें सफल हुए थे। हाँ यदि शिव के मस्तक की जटाओं वाली बात की कल्पना करें तो हम ये भी मान सकते हैं कि, शिव जो कि बहुत बड़े रसायन-शास्त्री, प्राणीशास्त्री और भौतिक-विज्ञानी थे उन्होने भागीरथ की इस महान कार्य में मदद की होगी।
ये तो बात है विज्ञान की, जिसको हम यहीं पर छोड़ देते हैं और चलते हैं गंगा की घाटी में गंगा के किनारे-किनारे एक अलौलिक आनंद की अनुभूति लेने के लिए। हरिद्वार के रेलवे स्टेशन तक साधारण-दर्जे के डिब्बे की यात्रा करते हुए हम बुरी तरह से थक गए थे, परंतु जब हर की पौड़ी पर पहुंचे तो पहले तो गंगा पल को पार करते हुए कुछ चक्कर से आने लगे, क्योंकि गंगा को कई धाराओं में बांटा गया है वहाँ पर, और हमारा एक साथ इतना पानी यूं बहते हुए कभी देखा नहीं गया था। पर कुछ देर बाद जब गंगा की शीतल और वेगवती धारा में अपने पाँव रखे तो रीढ़ की हड्डी तक सिहरन दौड़ गई। गंगा के शीतल जल में नहाने से रात की नींद, यात्रा की थकान सारी की सारी गायब हो गई। गंगा की धारा के बीच तैरते छोटे-छोटे बच्चों को देख कर मत तो बहुत किया कि हम भी उस वेगवती धारा का आनंद लें, परंतु हमारा रेगिस्तान में रहने वाला शरीर जो कि तैरना नहीं जानता उस धारा से दूर घाट पर लगी सांकलों तक ही सिमट कर रह गया। घाट पर एक औरत दूध लिए फिर रही थी, पूर्वजों को तर्पण करने के लिए वो दूध बेच रही थी, गंगा की पूजा के लिए पत्तों के दौनों में गुलाब, गैंदा के पुष्प और एक दीपक लिए भी बहुत सी औरतें अपनी दूकान लगाए बैठी थी। घाट के दूसरी तरफ गंगाजी का मंदिर था और कुछ दुःसाहसी लोग धारा में तैर कर गंगा मंदिर की परिक्रमालगा रहे थे।
हर की पौड़ी पर स्नान करने के बाद हम लोग मनसादेवी के मंदिर गए और वहाँ की ऊंची सीढ़ियों पर चढ़ते हुए हमारे एक साथी की तबीयत भी खराब हो गई थी। मनसादेवी मंदिर हिन्दू धर्म अनुसार देवी पार्वती का मंदिर है जो कि समुद्र मंथन के बाद जब शिव नीलकंठ में आकर बैठ गए थे तब उनको पुनः प्राप्त करने के लिए यहाँ पर तपस्या करने के कारण एक सिद्ध-पीठ के रूप में विख्यात हुआ। इतना महान स्थान होने के बावजूद यहाँ पर सरकार और मंदिर प्रशासन की तरफ से न तो सुरक्षा कीव्यवस्था थी और ना ही छाया-पानी या किसी भी प्रकार की कोई सुविधा ही दिखाई दी। यहाँ पर बस थड़ी वालों की तरफ से ही छाया-पानी की व्यवस्था की हुई दिखती है। मनसादेवी मंदिर से लौट कर हम लोग ऋषिकेश के लिए कुछ साधन देख रहे थे कि,साधन की तलास में भीमगोड़ा पहुँच गए थे, जाकर देखा तो पता चला कि, कभी जोप्रकृति का बेहतरीन नजारा हुआ करता था, उसे आज के बिना बुद्धि किए गए विकास के तांडव ने लील गया है। अब भीमगोड़ा एक ऐसा कुंड है जिसमें सिरेमिक टाइलें लगी हुई है और जल के नाम पर बस चंद बाल्टी पानी बचा है जिसमे बेचारी मछलियाँ तैर रही थी, भाग्य की मारी स्वार्थी मनुष्य की मारी। भीमगोड़ा पर एक बहुत प्राचीन शिवलिंग भी स्थापित है जो ना जाने कितने वर्षों पुराना है, पर उस शिवलिंग में बहुत बड़ा सा छेद हो गया है जिसमे एक बाल्टी पानी पूरा समा जाता है।
भीमगोड़ा से हमने विक्रम टैक्सी जो ऋषिकेश के लिए एक सुलभ साधन है ली और हरिद्वार से रवाना हो गए। बीच राह में रायवाला नाम का स्थान आता है जो कि राजाजी नेशनल पार्क का हिस्सा है। मेरे बचपन में एक बार रेलवे स्काउट के एक शिविर में मैं यहाँ पहले भी आ चुका था तो मेरे दोस्तों को मैं एक गाइड के रूप में रास्ते की जानकारी भी देता जा रहा था। रास्ते में सौंग नदी भी आई जिसमें कभी मैं बचपन में नहा चुका था। ऋषिकेश पहुंचे तब गंगा की आरती हो रही थी। झूलते हुए पल राम-झूले जिसे शिवानंद झूला भी कहा जाता है से उतर कर हम सबने गंगा आरती के दर्शन किए और फिर गीता-भवन में कमरे की व्यवस्था करने के बाद गंगा-स्नान के लिए गीता-भवन के सामने बने घाट पर पहुंचे। गीता-भवन जैसा नाम है वैसा ही स्थान है, स्वामी रामसुखदासजी, भाईजी हनुमानप्रसाद पोद्दार और जयदयालजी गोयन्दका द्वारा स्थापित ये धर्मशाला अपने-आप में एक तीर्थ है, जहां हर सुबह गीता पाठ, दिन में भागवत कथा और साँयकाल में भी धर्म-चर्चा चलती रहती है। ऋषिकेश में नहाने के लिए हरिद्वार की तरह से घाट तो बना दिये गए हैं लेकिन हरिद्वार की सी व्यवस्था यहाँ पर नहीं है,यदि दूसरे शब्दों में कहूँ तो यहाँ पर गंगा अपनी उन्मुक्तता में बहती है बिना कोई बंधन के, पूर्ण यौवन के साथ। रात के साढ़े-नौ बजे शीतल जल में उतरने के लिए कोई भी तैयार नहीं था, आखिर हिम्मत कर सभी ने अपने पाँव रखने के लिए माँ गंगा से अनुमति ली। फिर तो कब गंगा की गोद में एक घंटा बीत गया पता ही नहीं चला। रात के समय गंगा की धारा को देखने का आनंद कहा नहीं जा सकता, सूर्य की गर्मी शांत होने या हिमनद के कम पिघलने, या जो भी कारण हो रात में गंगा की गति में एक ठहराव सा दिखता है, लगता है जैसे पूरे दिन बहने के बाद अब गंगा आराम कर रही है।
रात्रि विश्राम के बाद सुबह हम फिर नहाने गए और गंगा की पूजा करने और पूर्वजों के नाम का तर्पण करने के बाद नीलकंठ महादेव के मंदिर के लिए रवाना हुए। नीलकंठ का पैदल रास्ता भी है, लेकिन हम छोटी जीप से गए थे। बद्रीनाथ जाने वाला रास्ता भी नीलकंठ की रास्ते से ही निकलता है। घुमावदार रास्ता, गहरी घाटियां और विशाल वृक्षों से हरी-भरी पहाड़ियाँ और विभिन्न प्रकार के फूल देख कर उस अनाम चित्रकार को प्रणाम किया जिसके बारे में प.भरत व्यास ने अपने लिखे गीत में पूछा है, ये कौन चित्रकार है।
नीलकंठ के दरबार में खड़े पुजारीजी, वहाँ पर व्यवस्था संभाल रहे सिक्योरिटी गार्ड जो कि एक महिला और एक पुरुष थे का यात्रियों के साथ मृदु व्यवहार देख कर मन प्रसन्न हो गया। नीलकंठ की भी बहुत रौचक कहानी है, कहा जाता है कि, जब समुद्र मंथन से प्राप्त हलाहल को भगवान शंकर ने पी लिया और फिर उस की जलन का शमन नहीं हुआ तो वो इस नीलकंठ महादेव नामक स्थान पर आ कर हिमालय की ऊंची छोटी पर बैठ कर समाधि लगा ली थी, जिससे उनको शीतलता मिली थी। नीलकंठ के रास्ते का वर्णन करना किसी साधारण मनुष्य के बस की बात नहीं, उसे सिर्फ आँखों के द्वारा पिया जा सकता है, पूरे रास्ते में मैं बहुत कम बोला और सिर्फ प्रकृति की उस सुंदरता को निहार रहा था, घाटियों के आध्यात्म को अपनी आत्मा में उतार रहा था,पहाड़ों के सम्मोहन में मोहित हो रहा था। मेरी स्थिति तो उस गूंगे की सी हो रही है,जो बस गुड़ के मीठेपन को महसूस कर सकता हूँ, पर बता नहीं सकता।
यात्रा का समापन भी हमने पुनः गंगा-स्नान से ही किया और माँ से पुनः दर्शन देने की विनती करते हुए रेल पकड़ ली। गंगा के प्रदूषण की बातों को, सरकार द्वारा नमामिगंगे योजना के विज्ञापनों को, गंगा को पुनः शुद्ध करने के संकल्पों की बातों को सुन रहा हूँ, और समझने की कोशिश कर रहा हूँ कि, जो गंगा एक बार थोड़ा सा उग्र हुई तो पूरे उत्तरकाशी जिले सहित पूरे उत्तराखंड राज्य में हा-हा-कार मच गया था, वो गंगा जिस दिन जरूरत पड़ी, क्या अपनी सफाई खुद नहीं कर लेगी? मेरा तो यही मत है कि, गंगा को बस बहने दो, निर्बाध, निर्विरोध और निर्मल।

हमाम में सब नंगे हैं

हमाम में सब नंगे हैं। कहावत बहुत पुरानी है, शायद इतनी कि उस वक्त जब ये बनी होगी तब तो हमारे पूर्वजों के भी पूर्वज भी पैदा नहीं हुए होंगे। कहावतों की बातें तो होती रहेगी हमेशा लेकिन ये कहावत कुछ अलग ही है। क्रिकेट देखते हुए लोग अक्सर आपस में उलझ जाते हैं दो टीमों को लेकर, दोस्तों में मन-मुटाव हो जाता है, कोई टीम हारती है और कोई जीतती है तो इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया जाता है। पर किसे पता है कि हम कल जिस मैच के लिए सर फोड़ रहे थे वो तो फिक्स था। कल हम जिस टीम के खिलाड़ियों के लिए लड़ रहे थे वो टीम और खिलाड़ी तो कब के ही बिक चुके थे।

अब आपस में हम चाहें झगड़े, चाहे तो सर फोड़ें, इनका क्या जाता है? ये तो सौदा कर चुके होते हैं आपकी भावनाओं का। इन्हें किसी की भावना, देश की इज्जत, टीम की हार-जीत से कोई वास्ता नहीं है। कोई मतलब नहीं है इन्हें। बस इनके तो दोनों हाथों लड्डू है और सिर कड़ाही में। हारे तो ही पैसे मिलेंगे और सटोरिये तो हैं ही इनके माई-बाप, पालनहार, तारनहार, अन्नदाता, क्या-क्या कहें इनको? पूरे समाज को और विशेषतः युवा वर्ग का सत्यानाश कर दिया है इन लोगों ने। सस्ती कामाइ की डगर दिखा कर और उस पर चला कर इन लोगों ने देश के साथ बड़ी गद्दारी की है। इन पर देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए।

देशद्रोही, गद्दार, पापी या भावनाओं के कातिल सौदागर? नहीं आज तक बनी ये सब गालियां इनके लिए कम है, बल्कि इन लोगों पर गालियों का प्रयोग तो खुद गालियों का अपमान है। इन लोगों को तो देशद्रोह के आरोप में सरेआम चौराहों पर मुंह काला कर के फांसी पर लटका देना चाहिए। परंतु नहीं फांसी तो शहीदों का गलहार हुआ करता है। इनको तो वो सजा देनी चाहिए जो आज तक किसी भी इतिहास और कानून की किताब में नहीं लिखी गई, नहीं देखी गई, नहीं सुनी गई।

हाँ ! शायद यही ठीक रहेगा कि इन्हें छोड़ दिया जाये खुला समाज में अकेला जहां कोई भी इनसे बात नहीं करे, कोई भी इनका सहयोग नहीं करे और कोई इन्हे अपने पास तक न फटकने दे। क्योंकि ये लोग इस लायक नहीं होते कि इनसे किसी भी प्रकार का भावनात्मक संबंध बनाया जाये। क्यों नहीं इनको समाज में ही रख कर समाज से ही काट दिया जाये.............।

वोटिंग जरूरी है

इन दिनों विधान सभा चुनाव में दिल्ली चुनाव आयोग, राजनैतिक पार्टियां, स्वयं सेवी संगठन , मीडिया आदि में दिल्ली के मतदाताओं को चुनाव में वोट देने की अपील की जा रही है। पर प्रश्न उठता है- "मै वोट क्यों दूँ ?" यह तो इसी तरह का प्रश्न हुआ जैसे कोई व्यापारी कहे - " मुझे ना ऊधो से लेना ,ना माधो को देना, मै बही खाते ( Books of Accounts) क्यों रखूँ ? जैसा की सब जानते है व्यापार में बही खाते को कई मामलों, कानूनों के अनुसार रखने की आवश्यकता है। जैसे इनकम टैक्स, वेट, एक्साइज, कस्टम-ड्यूटी, सर्विस-टैक्स, कंपनी-ला , बैंकर्स , कोर्ट- डिस्प्यूट , देनदारों, लेनदारों, साझेदारों, शेयर-होलडर्स, रिजर्व बैंक,लाभ-हानि निर्धारण, वस्तु की कीमत निर्धारण, कर निर्धारण आदि-आदि । व्यापार में " पहले लिख पीछे दे, भूल पड़े कागज़ से ले" का सिंद्धांत सदियों से चलता आ रहा है। बही खाते की महत्ता हर वर्ग , व्यापारी समझता है। राजनैतिक पार्टी के लिए भी बही खाते की महता स्पष्ट है। आय-व्यय का हिसाब-किताब व् चंदे आदि का हिसाब-किताब इसी से जाना जाता है । आज मीडिया में सुर्खी बने दो करोड़ का चन्दा देने वाली चारों कंपनियां व् चंदा लेने वाली राजनैतिक पार्टी बही-खाते की महत्ता को नकार नहीं सकती। किसी भी राजनैतिक पार्टी के चंदे के आरोप में घिर जाने पर यही बही-खाते बचाव में मुख्य हथियार होते है। ना खाता ना बही जो मै कहूँ वही सही, नहीं चलता l


आइये मूल प्रश्न पर आते है। प्रश्न है- मै वोट क्यों दूँ ? मै, मेरा रिश्तेदार, यार-दोस्त , जान-पहचान वाला जब चुनाव नहीं लड़ रहा तो मै लाइन में लग कर अपना कीमती समय क्यों बर्बाद करूँ ? मुझे किसी की हार-जीत से कोई फर्क नहीं पड़ता । वोट देने से मुझे कोई सरकारी नौकरी, लाभ या पद मिलने से रहा। अपना कमाता हूँ। अपना खाता हूँ। कोई सा...... रोटी नहीं देता ! वोट देने या न देने से मेरी जिंदगी पर क्या फर्क पडेगा ? वोट के चक्कर में क्यों पडूँ। सब चो..... है ! आदि-आदि।


उत्तर में कहा जा सकता है कि चुनाव में एक-एक वोट कीमती होता है। चुने जाने वाले नेता व् सरकार हमारी हर रोज की निजी व् सार्वजनिक जिंदगी में गाहे-बगाहे, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दखल देती रहती है। कभी महगाई को लेकर तो कभी क्सिी और चीज को लेकर । सरकार की ज़रा सी नीति हमारा जीवन स्तर सुधार या गिरा सक्ती है। हम नौकरी से हाथ धो सकते है। बिजली-पानी,सड़क, शिक्षा, अस्पताल, सुरक्षा, राशन, चाय-चीनी , दाल-चावल , गैस , पेट्रोल-डीजल आदि की उपलब्ध्ता व् कीमत सरकार की नीति पर निर्भर है। सरकार की रोजगार, विकास, विदेश, व्यापार , आर्थिक, उद्योग व् , टैक्स नीतियां आदि सब हमारे रोजमर्रा जीवन पर प्रभाव डालती है। पैदा होने से लेकर मरने तक सरकार का हर कदम हमें प्रभावित करती है। हमारी सुबह की चाय, बच्चों के दूध , बीमार की दवाई से लेकर नास्ते ,खाने , पहनने, घूमने, मनोरंजन आदि पर सरकार की नीति का डायरेक्ट या इनडायरेक्ट रूप से अवशय ही प्रभाव पड़ता है । एक तरह से सरकार हमारे भाग्य का निर्धारण करती है।


जब सरकार हमारे जीवन पर इतना प्रभाव डालती है तो फिर क्यों नहीं हम सरकार व् नेता के चुनाव में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते । अपने वर्तमान , भविष्य , बच्चों बेहतरी व् विकास के लिए रोजगार अधिक से अधिक अवसरों के लिए, सुरक्षा के लिए वोट करना जरूरी है। कोई भी ऐरा गैरा नत्थू खैरा हमारा भाग्य का निर्धारण कैसे कर सकता है ? जीवन पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालने वाले अकुशल नेतृत्व में हम सरकार की बागडोर कैसे सौप सकते है?


आइये शनिवार 7th Feb.15 को एक स्थिर, मजबूत, बहुमत वाली , गंभीर व् विकास करने वाली , अधिक रोजगार के अवसर देने वाली सरकार का चुनाव करने के लिए हम सबका साथ सबके विकास के लिए अधिक-अधिक संख्या में वोटिंग मशीन का बटन दबाकर अपना वोट दें ।


सुझाव- चुनाव आयोग को वोटिंग के लिए अधिक से अधिक प्रेरित करने के लिए वोटर को स्याही के निशान के इलावा छोटा सा यूनिक स्मृति चिन्ह भी भेंट करना चाहिए , जो वोटिंग का प्रतिशत बढ़ाने में सहायक होगा ।


" वोटिंग जरूरी है,बेहतरी के लिए " 

हिन्दी भाषा

हर बार की तरह इस बार भी १४ सितम्बर हिन्दी की याद दिला गया । हिन्दी का विकास हो रहा है, प्रचार - प्रसार में बड़ी -बड़ी बातें कहते हुए नीति नियन्ता, सब कितना अच्छा लगता है । मन को भी यह जानकर सांत्वना मिल जाती है कि वर्ष में एक दिन तो ऐसा आता है जिस दिन हिन्दी हर दिल अजीज हो जाती है । हिंदी दिवस के मौके पर राजनैतिक गलियारों में और स्वयं सेवी संगठनों के परिसरों में बेवजह का हल्ला किया जाता है, कहते हैं कि हिन्दी को प्रोत्साहन नहीं मिल रहा । भारत में सारे विभागीय काम विदेशी भाषा में होते है । ऐसे ही न जाने कितने कथित हिंदी प्रेमी आरोप - प्रत्यारोप करते हुए हिन्दी की संवैधनिक स्थिति को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं । कलुषित राजनीति को चमकाने के लिए दोषारोपण करते हुए हिन्दी को क्षेत्रीय परिसीमाओं में खदेड़ने की बाते भी आम होती है । लेकिन भाषा के नाम पर राजनीति करने वाले यह भूल जाते है कि हिन्दी किसी परिचय की मोहताज नहीं है । हिन्दी ने तो मुगलों और अंग्रेजों के राज में भी हार नहीं मानी, उत्तरोत्तर प्रगति करती गयी । कवि तुलसीदास , सूरदास , कबीर , रहीम , बिहारी और घनानंद जैसे सरस्वती साधकों ने हिन्दी को काफी मजबूती से विभिन्न रूपों में स्थापित किया है । चाहे हिन्दी , 'अवधी' और 'बृज' भाषा के रूप में रही हो या पालि , प्राकृत और अपभ्रन्श के रूप में, चाहें मगही , भोजपुरी और मैथिली के रूप में हर तरह से हिन्दी परिष्कृत हो कर आई है । पृथ्वीराजरासो , खुमाणरासो , परमालरासो , पद्मावत , अखरावट और आखरीकलाम जैसी रचनाओं ने हिन्दी को समृद्ध किया है । अंग्रेजों की प्रताड़ना के बीच मुंशी प्रेम चन्द्र जैसे व्यक्तित्व ने हिन्दी के गौरव शाली इतिहास की नींव रख उसे पुष्पित और पल्लवित किया । जिसे भारतेन्दु हरिश्चन्द्र , जयशंकरप्रसाद , मैथिलीशरण गुप्त , महावीरप्रसाद द्विवेदी , महादेवी वर्मा , निर्मल वर्मा आदि साहित्यकारों व इनके समकालीनों ने हिन्दी को नई बुलंदी पर पहुँचाया । भारत के आजाद होने के पश्चात १९५२ में हिन्दी भाषी संख्या के आधार पर विश्व में ५ वें स्थान पर थे । ८० के दशक में हिन्दी , चीनी और अंग्रेजी के बाद भाषियों की संख्या के आधार पर तीसरे पायदान पर थी । समय के साथ धीरे - धीरे २१ वीं सदी के पहले दशक में ही हिन्दी बोलने वालों की संख्या के आधार पर चीनी के बाद दूसरे क्रम पर आ गयी है । समालोचक इस जगह एक बात कहते हैं कि 'ज्यादा लोगों द्वारा बोलने वाली भाषा' हिन्दी इसलिए बन गयी है क्योंकि भारत की आबादी अधिक है । ठीक है मान लिया उनका कहना सही है लेकिन भाषा का प्रसार तो मात्रभूमि से होता है । आज जब हम वैश्वीकरण के युग में हैं तो एक दूसरे की संस्कृति और भाषा से परिचित हो रहे है । भारत को यह मौका काफी देर से मिला । जब सारे देश वि ज्ञान और विकास की कहानीगढ़ रहे थे, भारत गुलामी की जंजीरों में ज़कड़ा हुआ था । किन्तु आजादी के बाद विशाल आबादी को सँभालते हुए विकास करना प्रायः दुष्कर कार्य था , वो भी तब जब लोकतान्त्रिक व्यवस्था हो । लेकिन भारत बड़ी सूझ - बूझ से काम लेते हुए यहाँ तक आ पहुंचा है, जहाँ उसे विश्व की बड़ी और प्रभावी अर्थ व्यवस्था कहा जा रहा है । इस सफलता के पीछे भारत को एक सूत्र में पिरोने वाली भाषा हिन्दी का अहम योगदान रहा है ।
जो लोग कहते है कि भारत में आधिकारिक रूप से हिन्दी की जगह अंग्रेजी का वर्चस्व है वह कभी यह ध्यान नहीं देते कि उनके बच्चे भी हिन्दी छोड़ कुछ और ही पढ़ रहे हैं । कहते हैं बड़े दफ्तरों से लेकर न्यायालय तक अंग्रेजी का ही बोलबाला है , ऐसे में इसके पीछे का मनो विज्ञान जान लेना जरुरी है । अंग्रेजी सर्वमान्य वैश्विक भाषा है । वैश्विक विकास और वैश्विक संबंधों को अंग्रेजी ही आगे बढ़ा सकती है । ऐसे में अंग्रेजी को दोष देना उचित नहीं है । हाँ भारतीयों का अँग्रेज़ बनना ज़रूर हिन्दी को प्रभावित कर रहा है । उच्च आर्थिक स्तर का व्यक्ति हिन्दी बोलने में हीनता का अनुभव करता है तो आधुनिक युग का मध्यम वर्ग भी उसकी नकल का प्रयास करता है । फिर भी हिन्दी कहीं से कमजोर नहीं हुई है वरन् कई सोपान आगे बढ़ी है । शासन - प्रशासन को दोष देना आसान है लेकिन अपने गिरेबान में झांकने की हिम्मत नहीं है । हम बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा ही दिलाना चाहते है । हिन्दी को अगर हम घर में ही दुत्कारेंगे तो स्वाभाविक ही उसका ह्रास ही होगा । यहाँ तक कि नयी पीढ़ी खाना , पीना , उठना , बैठना और तो और दैनिक कार्य भी अंग्रेजी में करने लगी है । ऐसे में हिन्दी को ज़रूर ठेस लगती है । हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं राजभाषा है , इससे भी कोई फर्क नही पड़ता । उसे फ़र्क तब पड़ता है, जब कोई क्षेत्रीय भाषा कहकर इसे अपमानित करता है । जब सवा सौ करोड़ लोगों में हिन्दी बोलने वालों की संख्या महज़ ४० फीसदी हो । जब हिन्दी की रोटी अंग्रेज़ी की आग पर पकती है, तब हिन्दी को कष्ट होता है । अरे हिन्दी ने तो अपने बेटों से यहाँ तक कह दिया कि उर्दू और अंग्रेज़ी तुम्हारी मौसियाँ हैं । सारी भाषाएँ तुम्हारी पूज्य हैं । लेकिन आधुनिक भारतीयों के समझ में अब रिश्तों की अहमियत कम हो गयी है ।
आज विश्व भर में ५० करोड़ से ज्यादा लोग हिन्दी बोलते हैं, १०० करोड़ से ज्यादा हिन्दी समझते हैं । यूरोप में लगभग २५ हिन्दी पत्र - पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है । अमेरिका के लोग बड़ी संख्या में हिन्दी सीख रहें हैं । ऐसे में हमें खुशी होनी चाहिए कि भारतीय भाषा वैश्विक हो रही है । लेकिन हम हिन्दी को लेकर गंभीर नहीं हैं ।
आरोपों और प्रत्यारोपों की जगह सभी मिलकर हिन्दी को थोड़ी भी गम्भीरता से लें तो हिंदी विश्व की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा के साथ ही सुदृढ़ वैश्विक भाषा भी बन सकती है । वैज्ञानिकों के अनुसार हिन्दी एक वैज्ञानिक भाषा है । हिन्दी भावों की भाषा है । ऐसे में हिन्दी की स्वीकार्यता में तनिक भी संदेह नहीं है । बस आवश्यकता है हिन्दी को गर्व से अपनी पहचान के रूप में स्थापित करने की । यह हो पाएगा कि नहीं इसमें क्षेत्रीय परिदृश्य को देखते हुए समस्याएँ नज़र आती हैं ।

कैसी शिक्षा

देखा जाए तो क्या फर्क है अंगूठा लगाने और सिर्फ तीन-चार अक्षरों का नाम लिख लेने में, जबकि अपने हस्ताक्षर करने वाले को यही मालुम न हो कि वह जिस कागज़ पर अक्षर जोड़-जोड़ कर अपना नाम लिख रहा है उसका मजमून क्या है। आज छात्रों को College और Collage या Principal और Principle में फर्क नहीं पता। अंग्रेजी को तो छोड़ें हिंदी तक में B. Ed. करने वाले भावी शिक्षक ढंग से एक प्रार्थना-पत्र तक नहीं लिख पाते। 

शिक्षा व्यवस्था को लेकर हमारी सरकार काफी अव्यवस्थित रहती है। सरकारी कारिंदे सर से एड़ी का जोर लगा देते हैं कागजों में आंकड़ों को सुधारने में। पर यदि इसकी आधी ताकत भी सही ढंग से शिक्षा पद्यति को सुधारने में लगा दी जाए तो देश कागजों में नहीं, सही में साक्षर होना शुरू हो जाए। अभी तो अनपढ़ लोगों को सिर्फ अपना नाम लिखना सिखा उन्हें साक्षर घोषित कर दिया जाता है. देखा जाए तो क्या फर्क है अंगूठा लगाने और सिर्फ तीन-चार अक्षरों का नाम लिख लेने में, जबकि अपने हस्ताक्षर करने वाले को यही मालुम न हो कि वह जिस कागज़ पर अक्षर जोड़-जोड़ कर अपना नाम लिख रहा है उसका मजमून क्या है।

पर इससे सरकारी व्यवस्था को किसी से लेना-देना नहीं है वहाँ तो सिर्फ आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ा कर अपनी पीठ थपथपाने का खेलहोता है। बड़े शहरों और कुछ राज्यों को छोड़ दें तो बाक़ी जगह की एक भयानक तस्वीर सामने आती है। साक्षरता के आंकड़ों को बढ़ाने के लिए स्कूलों में आठवीं तक की पढ़ाई में से परीक्षा का प्रावधान ही नही होने से स्कूल-कालेजों में पढ़ाई का स्तर इतना गिर गया है कि स्नातक की पढ़ाई करने वाले छात्रों को College और Collage या Principal और Principle तक का फर्क नहीं पता।

अंग्रेजी को तो छोड़ें हिंदी तक में B. Ed. करने वाले भावी शिक्षक ढंग से एक प्रार्थना-पत्र तक नहीं लिख पाते। यही लोग जब येन-केन-प्रकारेण स्कूलों-कालेजों में नौकरी जुगाड़ कर पैसे की खातिर पढ़ाना शुरू करेंगे तो अंदाजा लग सकता है कि स्तर कहाँ पहुंचेगा।
संलग्न फ़ोटो में एक B. Comके छात्र का प्रार्थना पत्र देख आश्चर्य होना स्वाभाविक है. यह तो एक बानगी है। सोचने की तथा मंथन की बात यह है कि दोष किसका है , छात्र का, अध्यापक का या शिक्षा-प्रणाली का ? 
अभी कुछ दिनों पहले अखबारों में खबर छपी थी कि पांचवीं के छात्र दूसरी कक्षा की पुस्तक नहीं पढ़ पाते। तो स्कूलों में कैसी पढ़ाई होती है? क्या पढ़ाया जाता है ? कैसे पढ़ाया जाता है? इस पर कभी नियम-कानून बनाने वाले क्या ध्यान नहीं देते?

कहावत है कि नींव मजबूत होने पर ही इमारत बुलंद हो सकती है. पर जहां नींव ही हवा में हो वहाँ क्या आशा की जा सकती है। यही कारण है कि तरह-तरह के प्रलोभन दे बच्चों को हांक कर स्कूल तो ले आया जाता है पर जैसे-जैसे ऊंची कक्षाएं सामने आती हैं बच्चों की संख्या नीची होती जाती है। ऐसे में जरूरत है लोगों को जागरूक करने की. राजनीति से ऊपर उठ देश समाज की भलाई को प्राथमिकता देने की। अपनी कुर्सी को बचाने के लिए ऊल-जलूल नीतियों को लागू करने की बजाए लायक बच्चों को "कुर्सी" दिलवाने में मदद करने वाली शिक्षा-प्रणाली को लागू करने की। इसमें बुद्धिजीवियो और शिक्षाविदों की सलाह ली जाए और उसको अमल में लाया जाए ना कि ऐसे लोगो को इसकी बागडोर सौंपी जाए जिनका इस विधा से कोई नाता ही न हो।

ऐसा नहीं है कि इन परिस्थितियों से लोग अनजान हैं, कोशिशें हो रही हैं उनका सकारात्मक परिणाम भी नजर आता है. पर वे बहुत धीमी और नगण्य हैं, उन पर भी सियासत की काली छाया पड़ती रहती है। इसलिए जो समितियां गठित की जाएं उनमें ऐसे शिक्षाविदों को रखा जाए जिन पर राजनीति का कोई दवाब न हो नाहीं सियासत से कोई लेना-देना। विद्या सर्वांगीण विकास में सहायक हो ना कि लकीर की फकीर। शिक्षा ग्रहण करने वाले में कहीं भी कैसी भी परीक्षा में उभर आने का माद्दा हो, उसे किसी भी संस्थान में ससम्मान दाखिला मिल सके इतनी क्षमता हो। जिससे नामी शिक्षा संस्थानों को अपने द्वार पर यह लिख कर लगाने कि जरूरत न हो कि फलांने राज्य या संस्थान वाले यहाँ अपना प्रार्थना पत्र न भेजें

आओ हम भी एक जूनून को अपनाएं और बहाएँ अपनी एक नई धारा

अक्सर हमारा लोगों से मतभेद क्यों हो जाता है ? क्यों हम समय से समझौता नहीं कर सकते ? अपने आपको समयचक्र में समाहित क्यों नहीं कर लेते? आखिर हर जगह, हर वक्त और हर किसी व्यक्ति पर हम अपने फैसले थोंप तो नहीं सकते। तो फिर क्यों हम हर बार यही चाहते हैं कि सामने वाला हमारे सामने घुटने टेक दे। अगले की परिस्थिति को समझने की समझ हम क्यों नहीं विकसित कर पाते हैं ? जाने कैसी विकत परिस्थिति से गुजर रहा है वो ? जाने किस समस्या में घिरा है वो ? पर नहीं, हम समझौता नहीं कर सकते ? अगले को झुकाने के लिए खुद नहीं झुक सकते। आखिर क्यों ?
शायद हमने झुकना सीखा ही नहीं। पर क्यों ? शायद अपने-आप का अहम बहुत ज्यादा बलवान है हमारे अंदर। पर क्यों है ये इतना बलशाली ? शायद हमने इस पर कभी अंकुश लगाने की कोशिश भी नहीं की है। पर किसलिए नहीं की हमने ऐसी कोशिश ? शायद इसकी जरूरत ही महसूस नहीं की कभी। फिर वही सवाल कि आखिर जरूरत क्यों नहीं हुई ?
मानव स्वभाव ही ऐसा है। झुकाना ही चाहेगा, झुकना नहीं। हर किसी को सिर्फ समर्पण चाहिए पर खुद नहीं कर सकता। यही फितरत है इंसान की, हमेशा यही चाहेगा कि सभी उसके अनुसार ही चले। एक नजरिये से नजर डालें तो यही जूनून तो व्यक्ति को भीड़ में सबसे अलग करता है। समर्पण कराने की शक्ति ही व्यक्ति को विशिष्टता प्रदान करती है।
तो आओ हम भी एक जूनून को अपनाएं और बहाएँ अपनी एक नई धारा.............।