Wednesday, September 14, 2016

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हर चीज़ के दो पहलू होते हैं और हर जगह अच्छाई व बुरे एक साथ पाई जाती है.

हम लोग अक्सर ही पुलिसवालों को शक की नज़रों से देखते हैं. हमें लगता है कि हर पुलिसवाला रिश्वत लेता है, लोगों को तंग करता है, आरामतलब और बहुत ही खूसट किस्म का इन्सान होता है. अकसर इंटरनेट पर ऐसी तस्वीरें देखने को मिल जाएंगी, जिसमें कोई पुलिसवाला किसी से धन उगाही कर रहा है, तो किसी से पैर मालिश करवा रहा है. लेकिन हम भूल जाते हैं कि हर चीज़ के दो पहलू होते हैं और हर जगह अच्छाई व बुरे एक साथ पाई जाती है. लेकिन मसला ये है कि साल के 365 दिन, चौबीसों घंटे ड्यूटी करने वाले पुलिस विभाग के लोग भी तो इन्सान ही होते हैं. कहीं कुछ भी हो जाए, उन्हें डटकर खड़ा रहना होता है. जब उन्हें हम सिर्फ़ बुरा ही समझेंगे, तो वो हमें वैसे ही दिखेंगे.

अगर कुछ बुरे लोग इस डिपार्टमेंट में हैं, तो अच्छे लोगों की भी कमी नहीं है. आज हम आपके लिए कुछ ऐसे ही पुलिसवालों की तस्वीरें लाये हैं, जिन्हें देखने के बाद पुलिसवालों को लेकर आपकी राय बदल जाएगी.

सच तो ये है कि हम लोगों की सुरक्षा और सुविधा का ध्यान रखने और अपनी ड्यूटी निभाने के लिए ये बहुत कुछ कुर्बान करते हैं. ये जागते हैं, तभी हमारा, आपका परिवार सुकून से सोता है. गर्मी की धूप, बारिश के थपेड़े और सर्दी की खून ज़माने वाली रातें, अगर किसी के हिस्से में आती हैं, तो वो हमारे पुलिसवाले ही हैं. फिर भी ये कई बार हमारे सामने इंसानियत और ज़िम्मेदारी की मिसाल बन जाते हैं. 


समाज-सुधारकों ने समाजिक बुराईयों को ख़त्म करने की कोशिश की. आइए, समाज में दिए उनके योगदान के बारे में

जब देश आज़ाद हो रहा था, उस समय कई समस्याओं से जूझ रहा था. एक ओर आज़ादी की मांग चल रही थी, दूसरी ओर सामाजिक बुराईयों से. अंग्रेज़ देशवासियों पर अत्याचार कर रहे थे, वहीं सामंतवादी सोच से भी लोग परेशान दिख रहे थे. उस समय देश को अंग्रेज़ों से ज़्यादा सामंतियों से आज़ादी की ज़रूरत थी. जाति-पात, धर्म के नाम पर लोग आपस में घृणा कर रहे थे. इससे देश कमजोर हो रहा था. मौके की नज़ाकत को देखते हुए देश के कई समाज-सुधारकों ने समाजिक बुराईयों को ख़त्म करने की कोशिश की. आइए, समाज में दिए उनके योगदान के बारे में जानते हैं.

राजा राम मोहन राय (1772-1833)

सामाजिक सुधार के लिए जितना योगदान राजा राम मोहन राय का इस देश में रहा, वो अतुल्नीय है. दहेज प्रथा, बाल-विवाह, छुआछूत जैसी कुप्रथाओं का विरोध किया, तथा इसके लिए कड़े कानून की भी वकालत की.

Source: The Famous

महात्मा गांधी (1869-1948)

बात जब सामाजिक सुधार की हो, तो महात्मा गांधी इस सूची में सबसे पहले आते हैं. देश की आज़ादी हो, ग़रीबी उन्मूलन हो या फ़िर सामाजिक सुधार, महात्मा गांधी ने निष्पक्षता के साथ अपना योगदान दिया है. इस वजह से देश में गांधी जी को 'राष्ट्रपिता' का दर्जा मिला हुआ है.

ईश्वर चंद्र विद्यासागर (1820-1891)

अविभाजित बंगाल में समाजिक बुराईयों को दूर करने के लिए ईश्वर चंद्र विद्यासागर का योगदान अद्वितीय है. वे बंगाल के सामंतियों, पंडितों और ज़मींनदारों का विरोध करते रहे. इसके अलावा विधवा-विवाह पर भी उन्होंने ख़ूब ज़ोर दिया.


डॉ. भीमराव अंबेडकर (1891-1956)

भारत को हिन्दू आडंबरों से मुक्ति दिलाने का श्रेय डॉ. भीमराव अंबेडकर को जाता है. वे न सिर्फ़ एक कानूनविद् थे, बल्कि इस देश के पिलर भी थे. हिन्दुओं के बीच हो रहे भेदभाव को मिटाने के लिए उन्होंने बहुत मेहनत की. समाजिक क्षेत्र में सहयोग देने के लिए उन्हें 'भारत रत्न' से नवाज़ा गया है.

Source: Indian Express

जवाहर लाल नेहरू (1889-1964)

जवाहर लाल नेहरू भारत के न सिर्फ़ प्रथम प्रधानमंत्री, बल्कि स्वतंत्रता सेनानी भी थे. देश की आर्थिक मज़बूती, सामाजिक सुधार के लिए इन्होंने कई ऐसे कदम लिए, जिसका लाभ अभी भी देश को मिल रहा है.


मदर टेरेसा (1910-1997)

मानवता की मिसाल मदर टेरेसा का योगदान भला कौन भूल सकता है. लोगों के कल्याण के लिए इन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी खपा दी. समाजिक बुराईयों को दूर करने में इनका योगदान अकथनीय है.


बाबा आम्टे (1914-2008)

यूं तो बाबा आम्टे का जन्म एक अमीर घर में हुआ था. इन सबके बावजूद भौतिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर, उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी मानव कल्याण में लगा दी.

एनी बेसेंट (1847-1933)

विदेशी होकर भी एनी बेसेंट ने भारत के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया. समाज के वंचित तबकों के लिए एनी बेसेंट ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ ही युद्ध छेड़ दिया. वे अंग्रेज़ों की दमनकारी नीतियों का हमेशा विरोध करती रहीं. इसके लिए उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा.


स्वामी दयानंद सरस्वती (1824-1883)

वैसे तो स्वामी दयानंद सरस्वती को आर्य समाज के संस्थापक के रूप में जाना जाता है. हिन्दू धर्म में हो रहे पाखंड को खत्म करने के लिए उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की. वे मूर्ति पूजन का विरोध करते थे. इस वजह से हिन्दू समाज में एकता देखने को मिली.

स्वामी विवेकानंद (1863-1902)

स्वामी विवेकानंद को देश में एक विचारक रूप में जाना जाता है. 19वीं सदी में हो रही सामाजिक बुराईयों को ख़त्म करने के लिए 'रामकृष्ण मिशन' की स्थापना की. स्वामी विवेकानंद के विचारों को लोग आज भी अपनी ज़िंदगी में अपनाते हैं.

एक देश के विकास के लिए जितना आर्थिक बदलाव का महत्व है, उससे कहीं ज़्यादा महत्व सामाजिक बदलाव का है. इससे किसी भी देश का चाल और चरित्र तय होता है. देश के समाज सुधारकों ने अपनी मेहनत से एक ऐसे 'हिन्दुस्तान' की कल्पना की, जो समाजिक और आर्थिक रूप से काफ़ी सशक्त बन सके.  

डेंगू हो तो घबराने की बात नहीं है।

दिल्ली डेंगू के चपेट में है। सरकारी अस्पतालों में एक-एक बेड पर दो से तीन मरीजों के होने के बावजूद मरीजों को भर्ती करने के लिए जगह कम पड़ रही है। मौत के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं ऐसे में इन तमाम पहलुओं और डेंगू से लड़ने के लिए सरकार
नई दिल्ली। दिल्ली डेंगू के चपेट में है। सरकारी अस्पतालों में एक-एक बेड पर दो से तीन मरीजों के होने के बावजूद मरीजों को भर्ती करने के लिए जगह कम पड़ रही है। मौत के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं ऐसे में इन तमाम पहलुओं और डेंगू से लड़ने के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे इंतजामों पर दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य सेवाएं महानिदेशालय के महानिदेशक डॉ. एसके शर्मा से दैनिक जागरण के वरिष्ठ संवाददाता रणविजय सिंह ने बात की।

प्रश्न: डेंगू बुखार की पहचान क्या है?
जवाब: यदि किसी को डेंगू हो तो घबराने की बात नहीं है। शरीर में पानी की मात्रा ठीक रखें तो 99 फीसद लोग सिर्फ बुखार की एक दवा पैरासिटामोटल से ठीक हो सकते हैं। नींबू पानी, शिंकजी, जूस, नारियल पानी, दूध, लस्सी आदि तरल पदार्थ के सेवन अधिक करें। शरीर में पानी की मात्रा ठीक होने पर मरीज मर नहीं सकता और डेंगू बुखार समान्य तौर पर सात दिनों में ठीक हो जाता है। पानी की कमी होने पर ही मरीज को डेंगू शॉक सिंड्रोम हो जाता है। ऐसा सिर्फ एक फीसद मरीजों को ही होता है।
प्रश्न: डेंगू के शुरूआती लक्षण क्या होते हैं?
जवाब: बुखार, जुकाम, गले में दर्द, आंखों के पीछे दर्द महसूस होना इसके शुरूआती लक्षण होते हैं। पूरे शरीर में लाल निशान (चकते) बन जाते हैं व मांसपेशियों में दर्द होता है। यदि मरीज उल्टी शुरू कर दे तो यह गंभीर लक्षण होता है।
प्रश्न: इस बार डेंगू का प्रकोप अधिक क्यों हुआ, कहा चूक रह गई?
जवाब: दिल्ली में डेंगू हर साल होता है। इस बार मौसम मच्छरों के अनुकूल रहा है। जिसकी वजह से मच्छरों की उत्पत्ति अधिक हुई। इस कारण डेंगू के मामले अधिक आ रहे हैं। अभी भी मौसम में न अधिक गर्मी है और न ही ठंड। मौसम में नमी है। मौसम ऐसा ही रहा तो डेंगू के और मामले सामने आएंगे। अब तो जल्द मौसम बदलने और ठंड आने की कामना करना चाहिए।
प्रश्न: बीमारी से बचाव के लिए क्या करना चाहिए?
जवाब: लोगों को पूरी बाजू के कपड़े पहनने चाहिए। पांव में जुराब भी पहनें तो अच्छा होगा। डेंगू का एडीज मच्छर घर के अंदर साफ पानी में पनपता है। घरों में गमलों के नीचे ट्रे रखा होता है, उसमें मच्छर उत्पन्न होने की संभावना अधिक होती है। उसकी सफाई जरूरी है। घर में दिन के वक्त भी मच्छर मारने वाले क्वायल या लिक्विड जलाकर रखें। घर में मच्छरदानी लगाकर रहें। बच्चों पर विशेष रूप से ध्यान देने की जरूरत है। घर के आसपास साफ पानी जमा नहीं होने दे। हर सप्ताह कूलर की सफाई जरूरी है। कूलर के घासों में एडीज मच्छर के अंडे सालों रह सकते हैं। क्योंकि मच्छर के अंडे खराब नहीं होते। साफ पानी के संपर्क में आते ही लार्वा बन जाता है। इसलिए कूलर के घास को हर साल जला दें। क्योंकि मच्छर को मारना बहुत जरूरी है। जिस घर में डेंगू पीड़ित हो वहां स्प्रे जरूरी है। घर में डेंगू के मरीज को भी मच्छरदानी में रखा जाना चाहिए। क्योंकि हर मादा एडीज मच्छर वायरस संक्रमित नहीं होती। लेकिन यदि उस मरीज को काटने के बाद किसी और व्यक्ति को एडीज मच्छर काटता है तो वह डेंगू से पीड़ित हो सकता है। डेंगू में दर्द निवारक दवा नहीं लेना चाहिए।
प्रश्न: बीमारी की गंभीरता का पता लगाने का क्या तरीका है?
जवाब: इसके लिए फार्मूला 20 है। यदि ब्लड प्रेशर समान्य से 20 कम हो, प्लस रेट समान्य से 20 ज्यादा हो, उपर और नीचे के ब्लड प्रेशर का अंतर 20 से कम रह जाए या शरीर में 20 से ज्यादा रक्त स्राव का स्पॉट है तो माना जाता है कि मरीज की हालत गंभीर है। ऐसी स्थिति में मरीज को 20 एमएल प्रति किलो बॉडी वेट के मुताबिक प्रति घंटे पानी चढ़ाना पड़ता है।
प्रश्न: प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत कब होती है?
जवाब: यदि शरीर में प्लेटलेट्स की मात्रा डेढ़ लाख हो तो वह समान्य होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का दिशा निर्देश है कि यदि मरीज का प्लेटलेट्स घटकर 10,000 भी हो जाए और यदि शरीर के किसी हिस्से से रक्तस्राव नहीं हो रहा है तो प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत नहीं है। प्राइवेट अस्प्तालों ने मरीजों में भ्रम पैदा कर दिया है। रक्तस्राव होने व मरीज के शॉक में जाने पर प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत होती है।
प्रश्न: अस्पतालों में इलाज के लिए सुविधाएं कम पड़ रही हैं। इसके लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
जवाब: 50 फीवर क्लीनिक शुरू कर दिए गए हैं। यह क्लीनिक दो शिफ्टों में सुबह सात बजे से रात नौ बजे तक चलेंगे। वहां खून जांच, दो बेड, पानी चढ़ाने आदि की व्यवस्था की गई है। गंभीर मरीजों को तुरंत बड़े अस्पतालों में पहुंचाने के लिए एंबुलेंस मौजूद रहेगी। इसके अलावा 34 सर्विंलेंस अस्पताल हैं जहां इलाज की व्यवस्था है। सरकार ने अस्पतालों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि किसी गंभीर मरीज को भर्ती करने से इंकार नहीं करना है।
प्रश्न: यदि डेंगू खतरनाक नहीं है तो इस बार मौतें अधिक क्यों हो रही हैं?

जवाब: डेंगू के वायरस चार तरह के होते हैं। इस बार डेंगू-2 और डेंगू-4 दोनों के मामले आ रहे हैं। यह ज्यादा खतरनाक होता है। लेकिन बीमारी की रोकथाम के लिए पूरा महकमा जुटा हुआ है। सुबह सात से रात नौ बजे तक अधिकारी कार्य में जुटे रहते हैं। स्वास्थ्य मंत्री सतेंद्र जैन ने रविवार को एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया है, जिसमें आला अधिकारियों के अलावा सभी 11 जिलों के जिला स्वास्थ्य अधिकारी व अस्पतालों के चिकित्सा अधीक्षकों को शामिल किया गया है। इस ग्रुप के जरिए फीवर क्लीनिकों की निगरानी की जाएगी। प्रति दिन उस ग्रुप में फीवर क्लीनिक की तस्वीरें भेजने का निर्देश दिया गया है। सोमवार से मरीजों का आंकड़ा ऑनलाइन जारी किया जाएगा। इसके अलावा लोग ऑनलाइन यह भी देख सकेंगे किस अस्पताल में कितने बेड और आइसीयू में कितने वेंटिलेटर खाली पड़े हैं। इससे मरीजों को सुविधा होगी।

Friday, September 9, 2016

कहानी

"बड़ा मज़ा आया" जब ये वाक्य आप कह रहे होते है तब आप तो मजे में हो सकते हैं लेकिन कोई दूसरा इसे अपनी सज़ा भुगतने जैसा अनुभव करता है ठीक इसके विपरीत जब कभी आप सजा भुगत रहे होते हैं तब कोई आपकी सज़ा में मज़ा ले रहा होता है ..इसलिए इसे समझलो बेलेंस बनाने के काम आएगा

खाना कितना स्वादिष्ट है ? ये महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि ये महत्वपूर्ण है कि खाना कितना पौष्टिक है ..हम स्वाद में स्वास्थ्य खो देते हैं हमारी ये जीव हमको जल्दी से निर्जीव बनाने की फ़िराक में तो नहीं है? बस इतनी सी चीज़ मैं समझ नहीं पा रहा ... जिस दिन ये समझ में आजाये तो बहुत सी बातें समझ में आ जायेगी जैसे की अच्छे दिखने वाले लोग केवल उस स्वादिष्ट भोजन की तरह हैं ? या पुष्टिवर्धक हैं? या फिर हर वो वस्तु हर वो जगह हर वो काम मेरे केवल मनोरंजन का ही साधन मात्र है या फिर वस्तबिक काम का

इस संसार के लोगों की भी बड़ी बिडम्बना है अक्सर वही लोग उपदेश देते हैं जो स्वयं उपदेश की हुई बातों पर अमल नहीं करते ... क्या यह एक मानवीय सहज स्वाभाव है ? या कुछ और ... अक्सर देखने को मिलते हैं और कभी हम भी ऐसा ही कर जाते हैं

एक बार की बात है, एक खरगोश बहुत ढींगे मार रहा था की वो कितना तीव्र भाग सकता है और वो जंगल में रहने वाले कछुए का उपहास कर रहा था की वो कितना धीमा है। यह सुन कर कछुए ने खरगोश को दौड़ की चुनौती दे दी। | दोनों ने दौड़ करने का निर्णय लिया। जैसा की सबने सोचा था, खरगोश दौड़ प्रारंभ होते ही तीव्रता से कछुआ से आगे निकल गया। अभी दौड़ते-दौड़ते थोड़ा ही समय गुज़रा था कि खरगोश ने पीछे मुड़कर देखा कि कछुआ काफी पीछे रह गया है | उसने सोचा कि कछुए की चाल तो बहुत ही धीमी है इसलिए मैं थोड़ी देर विश्राम कर लेता हूँ | वह एक पेड़ की ठंडी छाँव में ऐसा सोया कि कछुआ, धीमी चाल होने के बावजूद भी, उससे आगे निकल कर अपने गन्तव्य तक पहुँच कर दौड़ जीत गया | जब खरगोश नींद से उठा तो उस से कछुआ दिखाई नहीं दिया। खरगोश दौड़ जितने के लिए गन्तव्य की ओर दौड़ा और आश्चर्य में कछुए को वहां उसकी प्रतीक्षा करता पाया ।
One day a rabbit was boasting about how fast he could run. He was laughing at the turtle for being so slow. After hearing this the turtle challenged the rabbit for a race. They decided to race to see who is faster. As the race began, the rabbit raced way ahead of the turtle, just like everyone thought. The rabbit turned around to see if he can find the turtle and found him way behind him. The rabbit decided to stop and take a short nap as the turtle was very slow. As the rabbit slept under a tree, the turtle races to the destination with his slow pace. Even with his slow pace, the turtle run to the destination as the rabbit slept and won the race. He could not see the turtle anywhere! He went at full-speed to the finish line but found the turtle there waiting for him.
एक समय की बात है, एक राजा ने एक पालतू बन्दर को अपने सेवक के रूप में रखा हुआ था। जहाँ जहाँ राजा जाता, वह बन्दर भी उसके साथ जाता। राजा के दरबार में उस बन्दर को राजा का पालतू होने के कारण कोई रोक टोक नहीं थी। एक गर्मी के मौसम के दिन राजा अपने शयन पर विश्राम कर रहा था। वह बन्दर भी शयन के पास बैठ कर राजा को एक पंखे से हवा कर रहा था। तभी एक मक्खी आई और राजा की छाती पर आकर बैठ गयी। जब बन्दर ने उस मक्खी को बैठा देखा तो उसने उसे उड़ाने का प्रयास किया। हर बार वो मक्खी उड़ती और थोड़ी देर बाद फिर राजा की छाती पर आ कर बैठ जाती। यह देख कर बन्दर गुस्से से लाल हो गया। गुस्से में उसने मक्खी को मारने की ठानी। फिर वो बन्दर मक्खी को मारने के लिए हथियार ढूडने लगा। कुछ दूर ही उसे राजा की तलवार दिखाई दी। उसने वो तलवार उठाई और गुस्से में मक्खी को मारने के लिए पूरे बल से तलवार राजा की छाती पर मार दी। इससे पहले की तलवार मक्खी को लगती, मक्खी वहाँ से उड़ गयी। बन्दर के बल से किये गए वार से मक्खी तो नहीं मरी मगर उससे राजा की मृत्यु अवश्य हो गयी।

इसलिए कहते है कि मूर्ख को अपना सेवक बनाने में कोई भलाई नहीं!

विचार

टांग खिंचाई ? हर बात की टांग खिंचाई हो सकती है यहाँ ख़राब से ख़राब बातों को अच्छा साबित करने वाले लोगों की भी भरमार है और अच्छी बात को बेकार बतलाने वाले लोगों की कम्युनिटी भी है तो ऐसे में मैं क्यूँ अपनी बात का पोस्टमार्टम कराऊँ ? क्यों टांग खिंचाई कराऊँ? फायदा भी कुछ नहीं है जिससे कि कुछ गन्दी मानसिकता के प्रदुषण रोक सकूँ? इसलिए मौन हूँ लेकिन अंतर् से नहीं अगर होता तो ऐसी हलचल भी मुझे महसूस न होती ...बस यही फैसला आपके चिल्लाने और मेरे मौन का है ..मेरे चिल्लाने से आपके कान में जूँ रेंगती तो इतने ही से मैं अपनी संतुष्टि ढूंढ लेता ..मगर ऐसा था ही नहीं इसलिए हो गया मैं मौन

जैसे एक खेल का खिलाडी मस्तिष्क और शक्ति के योग से निर्धारित स्थान पर अपनी गेंद को फेंकता है उसी प्रकार आपका लक्ष्य और शक्ति (बुद्धि,बल) का योग आपकी मनोवांछित सद्भिष्ट की पूर्ति का कारण बनता है और उसके दोनों पहलुओं में से कहीं कमी रह जाती है तो फिर केवल खिन्नता ही रह जाती है

वेहद नासमझ और मुर्ख हैं वो लोग जो किसी के भड़काने पर या उकसाने, कान भरने पर उस व्यक्ति के बारे में जो कुछ समझ लेते हैं ऐसे लोग डबल गलती करते हैं 1ली तो यह है की जिस व्यक्ति के साथ तुम स्वयं होकर भी उसे अपने स्तर से समझ नहीं पाये अर्थात् यह भी lack of mind को दर्शाता है अब बात करते हैं दूसरी गलती की वो यह है कि अब आप किसी तीसरे व्यक्ति से उसे समझने की कोशिस में कुछ का कुछ समझ लेते हैं जो यथार्थ से कहीं बहुत दूर है ऐसे समझदारी बजाय सुलझने के और उलझ जाती है। और ऐसे व्यक्ति को आप भी प्रयास मत करिये सुलझाने का क्योंकि उसकी गति उलझने में ही है वो उसी के लायक है । सुलझे हुए मस्तिष्क वालों के लिए तो सर्वप्रथम स्वयं का विवेक होना जरुरी है

दूसरों को क्यों जानें ? क्यों समझें? कहने वालों तुम्हारे कारण ही आज हम न ठीक से अपना समझ पाये और न दूसरों का बात समझ पाये .. बस बहुत हुआ अब थोड़ी मेहनत और ज्यादा कर लेंगे अब उन को भी सुनेंगे जानेंगे और उससे कहीं अपने को जानेंगे और फिर उनकी बातों का प्रतिकार ठीक ठीक होगा ... क्योंकि आपसे बड़ा विशाल धर्म गुण वाला इस धरा पर कोई नही था न है न होगा ..समझो अपने आप को, आ लौट चल तू अपनी ओर वहां तेरा न ठिकाना

अक्सर आप अनुभव करना जो महान आत्मा इस धरा पर कुछ आत्मोन्नति का कार्य कर जाते हैं उन के जीवन काल के लोग उन्हें बहुत कम ही समझ पाते हैं और बाद में उनके जाने के बाद तो उनकी बातों के विरोधी भी अपनी सही छाप लगाने के लिए कूद पड़ते हैं

एकांत में नेत्र बंद किये ध्यानस्थ योगी को तू अकेला और एकांतिक मत समझ ..ये तेरी भूल है क्योंकि यूं इन आँखों से जिस दुनियां को पूरा नहीं देख सकता है उन्हें वो बंद आँखों से तुझसे कहीं बहुत बेहतर देख समझ पाता है उन दिव्य द्रष्टा की भूमि काशी को मेरा ह्रदय अभी अत्यंत अल्प ही समझ पाया है

जैसे बीज के अभाव में वृक्ष का जन्म नहीं हो सकता, ठीक वैसे ही उच्च विचारों के अभाव में उच्च कर्म घटित नहीं हो सकता। शुभ कर्म और अशुभ कर्म दोनों कर्मों के पीछे जो कारण है वह विचार ही है। हमारे विचारों का स्तर जितना श्रेष्ठ और पवित्र होगा हमारे कर्म भी उतने ही श्रेष्ठ और पवित्र होंगे।
कोई चोर जब तक चोरी नहीं कर सकता, जब तक कि वह पहले उसका विचार न कर लें। अत: हमारा कोई भी कर्म कार्य करने से पहले विचारों में घटित हो जाता है। विचारों का स्तर हमारे संग पर निर्भर करता है। हमारी संगति जितनी अच्छी होगी हम उतने ही अच्छे विचारों के धनी होंगे।
जब तक हमारे विचार शुद्ध नहीं होंगे तब तक हमारे कर्म भी शुद्ध नहीं हो सकते। इसलिए विचारों को शुद्ध किये बिना कर्म की शुद्धि का प्रयास करना व्यर्थ है। जिसके विचार पवित्र हों उससे बुरा कर्म कभी हो ही नहीं सकता है।