Tuesday, September 20, 2016

क्या हुआ जो तुमको चेहरा बदलना आ गया ... हमको भी हालात के साचे में ढलना आ गया ...

क्या हुआ जो तुमको चेहरा बदलना आ गया ...
हमको भी हालात के साचे में ढलना आ गया ...
रौशनी के वास्ते धागे को जलता देख कर ...
ली नसीहत मोम ने उसको भी पिघलना आ गया ...
शुक्रिया ए दोस्तों बेहद तुम्हारा शुक्रिया ....
सर झुका कर जो मुझे रस्ते पर चलना आ गया ....
सरफिरि आँधी का जरा सा सहारा क्या मिला ....
धूल को इंसान के सर तक उछालना आ गया ....
बिछ गए खुद ब खुद रास्ते में कितने ही गुलाब ....
जब हमे काटो पे नंगे पॉव चलना आ गया ....
चाँद को छूने की कोशिश में तो नाकामी मिली ....
हाँ मग़र नादान 'किरण,को जीना आ गया ....
पहले बचपन फिर जवानी फिर बुढ़ापे के निशा ...
उम्र को भी देखिये कपड़े बदलना आ गया ...!!

Sunday, September 18, 2016

सत्ता का प्रतीक!ताकत का अहसास! लोकतंत्र की दुहाई!

केंद्र और राज्य सरकार से विज्ञापन ना मिलने पर राजस्थान पत्रिका वाले श्रीमान गुलाब कोठारी जी ने लिखा, ''हम तो हमेशा की तरह अपने पाठकों के बूते अपना कुछ सामान बेचकर भी अगले ढाई साल गुजार देंगे।'' बहुत अच्छी बात। अपना सामान बेच बेच कर भी पत्रकारिता को जिंदा रखने वाला इस युग मेँ कोई विरला ही हो सकता है। उनके शब्द काफी क्रांतिकारी हैं। ऐसा कहना मिसाल है और करना बेमिसाल होगा। पत्रकारिता मेँ नए युग की शुरुआत होगी। ऐसे शब्द और जज्बा किसी योगी और फकीर के पास ही होता है। उनके शब्दों को पढ़ मुझे भी हौसला हुआ। मानसिक रूप से उनके चरणों को प्रणाम किया और उनकी सोच को अभिनंदन। शब्दों से प्रेरित हो तय किया कि अपना कुछ ना कुछ बेच कर बंद किया अखबार फिर शुरू करूंगा। मैं तो अभी इसकी तैयारी ही कर रहा था कि क्रांतिकारी शब्दों के रचयिता के अखबार मेँ प्रलाप दिखा।
प्रलाप अर्थात रुदन। विज्ञापन ना मिलने का प्रलाप। सरकारों की कृपा ना बरसने का प्रलाप। समझ नहीं आया कि ऐसे ज्ञानी, ध्यानी, धार्मिक, आध्यात्मिक, स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के अखबार मेँ ऐसा प्रलाप! वेद, उपनिषद, बड़े बड़े शास्त्रों, ग्रन्थों पर टीका लिखने वालों के अखबार मेँ किसी की दया ना मिलने पर ऐसा प्रलाप! पाठकों को मोह, माया, लोभ, क्रोध आदि विकारों से दूर करने के प्रवचन कर मोक्ष के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वालों के अखबार मेँ सरकारी विज्ञापनों के लिये ऐसी हाय तौबा। इतनी पीड़ा। दिमाग भन्ना गया। विश्वास ही नहीं हुआ। ऐसा कैसे हो सकता है!
हर हाल मेँ सम रहने के उपदेश देने वाले इत्ती से बात पर रोना पीटना कैसे कर सकते हैं! परंतु लिखे शब्द तो इतिहास बन जाते हैं। शब्द भी उसमें थे, जो कभी झूठा लिखता ही नहीं। एक एक शब्द सच्चा। मतलब वह प्रलाप ही था। पहले तो सामान बेच कर बंद अखबार को शुरू करने का विचार त्यागा। फिर उधर भागा, जिधर पिछले सप्ताह के अखबार रखे थे। भागा इसलिये कि कहीं बीवी ने बेच ना दिये हों। मिल गए। देखा, पढ़ा। इस मुद्दे  पर बड़े बड़े नेताओं से उनके विचार पूछ कर प्रकाशित किये जा रहे हैं। जिस से पूछोगे वह निश्चित रूप से हां मेँ हां ही  मिलाएगा। यही कहेगा, यह संविधान प्रदत अधिकारों का हनन है, विज्ञापन बंद करना दुर्भाग्यपूर्ण है। कोई निंदा करेगा। कोई इसके लिये आवाज उठाने का वादा करेगा। कोई ये क्यों कहेगा कि विज्ञापन नहीं मिले तो ठीक हुआ, सरकारी धन बचा। परंतु सवाल ये कि पत्रकारिता क्या केवल सरकारी विज्ञापन पर आधारित है?
विज्ञापन नहीं मिले तो पत्रकारिता का दी एंड। विभिन्न क्षेत्रों मेँ अपना रुतबा, गौरव, सम्मान  स्थापित करने वाला आज सरकारी सहायता के इतने मोहताज हो गए कि विज्ञापन बंद हुए तो प्रलाप करने लगे! पत्रकारिता की उतनी समझ तो नहीं जितनी उनको है, लेकिन इतना तो एक साधारण से साधारण पत्रकार भी समझ जाएगा कि विज्ञापन के लिये रोज रोज प्रलाप करना तो पत्रकारिता नहीं हो सकती। यह पत्रकारिता की धार को कुन्द करने वाला है। पत्रकारिता के तेज को कम करेगा। अखबार और उसके मालिक, दोनों की चमक फीकी पड़ जाएगी। आभा कम होगी। पत्रकारिता मेँ दम है तो करो सरकारों के काम काज मेँ रही कमियों का भंडा फोड़। टिकाओ उनके घुटने। करो उनको मजबूर नीति बदलने को। किन्तु इधर तो उलटा हो रहा है।
पत्रकारिता के घुटने टिके हुए नजर आ रहे हैं। घुटने टेक के विज्ञापन ले भी लिये तो कौनसी उपलब्धि होग! पता नहीं बड़े बड़ों की ये कैसी पत्रकारिता है। इतना प्रलाप तो गंगानगर से प्रकाशित अखबारों के मालिक नहीं करते, जितना ये कर रहे हैं। विज्ञापन तो कभी ना कभी शुरू हो ही जाएंगे, परंतु क्या तब भी इनकी पत्रकारिता के तेवर यही रहेंगे! संभव नहीं। किसी की दया लेने पर नजर झुकती ही है। हमारे जैसा कोई कर भी क्या सकता है। बड़ों की बड़ी  बात। समर्थ को दोष नहीं। शायर मजबूर की लाइनें पढ़ो-
कहना है इतना कुछ कह नहीं सकते
फितरत है अपनी चुप रह नहीं सकते
झूठ पे लानत हर कोई फेंके
सच कहते हैं सच सह नहीं सकते।

दिल्ली! सत्ता का प्रतीक!ताकत का अहसास! लोकतंत्र की दुहाई! संविधान के रास्ते चलने के वादे को ढोती दिल्ली! लोकतंत्र के हर पाये की स्वतंत्रता का सुकून छिपाये दिल्ली! बिहार-बंगाल में जंगल राज हो सकता है, दिल्ली में नहीं। यूपी में सत्ता जाति में सिमटी दिखायी दे सकती है, लेकिन दिल्ली में नहीं। विकास की अनूठी पहचान बना चुका पंजाब आतंक से लेकर ड्रग्स में डूब जाता है, लेकिन दिल्ली में ऐसा नहीं हो सकता। तमिलनाडु तमाम विकास के दावे करते हुये भी अम्मा भोजन के भरोसे जीता है, लेकिन दिल्ली में ऐसा नहीं होता। महाराष्ट्र की सियासत कभी लुंगी को पुंगी बनाने की धमकी देती है तो कभी यूपी-बिहार के लोगों को घुसने से रोकने पर नहीं कतराती और सत्ता खामोशी से तमाशा देखती है। लेकिन दिल्ली में ऐसा नहीं हो सकता। राजस्थान-हरियाणा-यूपी में सत्ता के भरोसे दामादों को सहूलियत दी जा सकती है लेकिन दिल्ली में ये संभव नहीं है।

दिल्ली ने तो आपातकाल के दौर में सत्ता के राजकुमार से भी दो दो हाथ किये और दिल्ली में तो नौकरशाही भी मंडलकमंडल के दौर में टकराए। अदालतों ने भी ग्रीन दिल्ली से लेकर टूजी तक में ना सिर्फ अपने फैसलों से सत्ता को हकबकाया। बल्कि जेल की सीखचों के पीछे कारपोरेट-नेता-मंत्री तक को पहुंचाया। यूं हर दौर में दिल्ली की ताकत लुटियन्स की दिल्ली में सिमटी दिखी। साउथ ब्लाक से लेकर आईआईसी तक के चेहरे सत्ता का मुखौटा कुछ यूं लगाते कि लड़ाई राजपथ की हो या जनपथ की, बात भ्रष्टाचार की हो या घोटालों की, सबकुछ संसद के भीतर बाहर समझौतों में ही सिमट जाता। लेकिन इस दौर में एक आस मीडिया ने जगाई।

जबजब देश में ये बहस हुई कि मीडिया सत्ता की चाकरी कर रही है, तब किसी एक्टिविस्ट की तर्ज पर दिल्ली में ही एक मीडिया संस्थान ने इंदिरा की सत्ता से दोदो हाथ किये। इमरजेन्सी के दौर में संघर्ष करते हुये सत्ता पलटने में खासी भूमिका निभायी। इंडियन होने के बावजूद इंदिरा इज इंडिया कहने वालों से वह मीडिया संस्थान टकराया। जब बोफोर्स घोटाले की आग सत्ता के खिलाफ सत्ता के भीतर से निकली तो दक्षिण भारत से निकलने वाले एक अखबार ने सत्ता की हवा सच छाप कर निकाल दी। हिन्दुत्व के दायरे में सबसे बेहतरीन हिंदू शब्द के तेवर अखबार की रिपोर्टिंग ने दिखला दिये और जब देश में सत्ता का दामन हवाला रैकेट में फंसा तो एक संस्थान ने बेहिचक ऐसी रिपोर्ट छापी कि सत्ता का ऊपरी आवरण ही ढहढहाकर गिर गया । तो दिल्ली में पत्रकारिता का अपना सुकून है। क्योंकि यहां लोकतंत्र भी जागता है तो मीडिया के हमले सत्ता को भी लोकतंत्र का पाठ पढ़ाते हैं और सत्ता भी अपनेअपने तरीके से मीडिया पर हमले कर लोकतंत्रिक व्यवस्था को बरकरार रखने के लिये एक सियासी वातावरण खुद ब खुद तैयार करती चली जाती है।

लेकिन इस बार हालात बदले हैं, तरीका बदला है, लोकतंत्र की परिभाषा भी बदली बदली सी लग रही है। क्यों……..क्योंकि खबर को छूने से हर कोई कतरा रहा है। हर कोई जान रहा है कि खबर सत्ता की चूलें हिला सकती है लेकिन हवा में तैरती सत्ता की मदहोशी ने पहली बार खुमारी कम खौफ ज्यादा पैदा कर दिया है। तो इंदिरा की सत्ता को एक वक्त चुनौती देने वाला मीडिया संस्थान भी खामोश है। एक वक्त बोफोर्स घोटाले से सत्ता की कमीशनखोरी से देश में सियासत गर्म करने वाला अखबार भी खामोश रहना चाहता है।हवाला के जरीये लाखों की हेराफेरी करने नेताओं के नाम तक छापने वाला और कागज में दर्ज हस्ताक्षर और छोटेछोटे इंगित करते नामों की पूरी व्याख्या करने वाला मीडिया संस्थान भी इस बार खामोश है। कहीं रिपोर्टर तो कही संपादक तो कही मालिक ही सिमटे है। लेकिन खबर सबको पता है। खबर छापने का दंभ भरने वाले दिल्ली के तमाम ताकतवर मीडिया संस्थानों की हवा पहली बार दस्तावेजों को देखकर ही हवाहवाई क्यों हो रही है?

तो क्या दिल्ली बदल चुकी है? लोकतंत्र की परिभाषा भी अब दिल्ली की अलग नहीं रही। या फिर पहली बार सत्ता ने हर संस्थान को सत्ता का हिस्सा बनाकर लोकतंत्र का अनूठा पाठ शुरु कर दिया है। जहां सहूलियत है, जहां खौफ है, जहां बदलाव है, जहां मुनाफा है, जहां सत्ता ना बदल पाने की सोच है, जहां विकल्पहीन हालात हैं, जहां धारा के खिलाफ चलने पर बगावती होने का तमगा लगने वाली स्थिति है।

यानी पत्रकारिता कुछ इस तरह गायब की जा रही है, जहां रिपोर्टर को भी लगने लगे कि वह सत्ता के सामने या सत्ता के पीछ खड़ा है। संपादक भी मैनेजर नहीं बल्कि वैचारिक तौर पर लकीर के इस या उस पार खड़ा होने का सुकून भी पाल रहा है और हवा में घुलते राष्ट्रवाद को राजपथ पर चलते हुये ही देख-समझ पा रहा है। तो क्या पहली बार मीडिया के लिये खबर छापना या ना छापना पत्रकारिता या धंधा नहीं राष्ट्रवाद है।

राष्ट्रवाद पहली बार अदालत के दायरे में नहीं लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था चुनावी राजनीति में जा सिमटा है। जो जीते उसी का राष्ट्रवाद सबसे बेहतरीन, जिसका अपना संविधान है और इस संविधान के दायरे में एक सा खुलापन है, जहां बोलने की आजादी है। जहां कुछ भी खाने-पीने की आजादी है। जहां चीन-अमेरिका को लेकर तर्क करने की आजादी है। जहां आतंक पर चर्चा की पूरी गुंजाइश है। जहां विदेशी निवेश को स्वदेशी मानने की पूरी छूट है। जहां भ्रष्टाचार,घूसखोरी, कमीशनखोरी, नीतियों के लागू ना होने के हालात पर आरोप लगाने की छूट है और संविधान से मिली इस स्वतंत्रता को भोगने के लिये सिर्फ बिना कहे ये समझने की जरुरत है कि देश से बढ़कर कुछ भी नहीं और देश का मतलब ही सत्ता है और सत्ता पर कोई आंच पांच बरस तक नहीं आनी चाहिये, इसकी जिम्मेदारी नागरिकों की है। क्योंकि पहले की सत्ता में देश के नाम पर धंधा करने वाले मौजूदा दौर में तो समझ चुके हैं कि उनका मुनाफा, उनकी सहूलियत, उनकी सुविधा का खास ख्याल रखा जा रहा है।

सवाल है कि कैसे लोकतंत्र का यह मिजाज अनंतकाल के लिये हो जाये? बस यही समझ नहीं आ रहा है क्योंकि जो खबर दिल्ली के बाजार में है, जो खबर हर कोई जान रहा है, जिस खबर को देखकर हर पत्रकार की बांछे खिल जाती हैं, जिस खबर के छपने से पत्रकारीय साख मजबूत हो जाती है, फिर भी उस खबर को कोई क्यों खुद से अलग कर रहा है? इस दिलचस्प कहानी के भीतर इतने चरित्र हैं, जिन्हें कुरेदना दिल्ली को दौलताबाद ले जाने से कम नहीं है। आइये फिर भी मीडिया संस्थानों की अट्टलिकाओ में घुस कर देखा जाये मुश्किल है कहां। क्योंकि हर मीडिया संस्थान के भीतर खबरों को लेकर नायाब तरीके की उथल-पुथल लगातार चल रही है और खामोशी से हर कोई खबरों से ज्यादा बदलते देश की तासीर को समझ कर खामोश है कि जो खबरों के झंडाबरदार इस दौर में बने पड़े हैं दरअसल वह रामलीला के चरित्रों को जीते हुये अपनी अपनी भूमिका को ही सच मान रहे हैं।

आपको जिसके खिलाफ लिखना है लिख लें, लेकिन इन दो को छोड़ना होगाक्यों, तब तो बहुत ही मोटी लक्ष्मण रेखा खींचनी होगी।ये तो बेहद महीन लकीर खींचने की बात है। बाकी तो आपको हर पर कलम चलाने की छूट है। अब आप लोग जो समझें, लेकिन हम झुकते नहीं हैं और हमारी पत्रकारीय धार का लोहा दुनिया मानती है। तो सोचिये धार भी बरकरार रहे और समझौता होते हुये भी ना लगे कि हमने कुछ छुपाया। ठीक है।

नहीं हम ऐसी खबरों के पीछे नहीं भाग सकते जिसे छापना मुश्किल हो, रिपोर्टरों को भी ऐसी खबरों के पीछे मत भगाइये, नहीं तो वह खबर ले कर आयेंगे, दस्तावेज जुगाड कर लायेंगे, उन दस्तावेजो को लेकर आप उन्हें लंबे वक्त तक जांच कर रहे हैं, कहकर भटका भी नहीं सकते हैं। तो इस रास्ते पर चलें ही नहीं।अगर कोई भूले भटके ऐसी खबर ले भी आया जो हमारे अखबार के खांचे में सही नहीं बैठती है तो” ” ……तो क्या आप सीनियर हैं। आप संपादक है। अब ये हुनर तो आपके पास होना ही चाहिये।

खबरों को आने से मत रोकिये, जो आ रही है आने दें। लेकिन कोई भी ऐसी खबर जो देश की हवा बिगाड दे उसे ना छापें। ना ही डिस्कस करें।लेकिन ऐसी खबरों का मतलब होगा क्या। देश की हवा का मतलब क्या है? पाकिस्तान से युद्ध का माहौल या आतंकवाद को लेकर कोई गलत पहल। ना ना ….देश की राजनीति को समझिये। इस दौर में देश संकट से भी गुजर रहा है और विकास की नई परिभाषा गढ़ने के लिये मचल भी रहा है। तो हमें देश के साथ खड़ा होना होगा, जो देश के हक में निर्णय ले रहा है उसके हक में।तब तो विपक्ष की राजनीति का कोई मतलब ही नहीं होगा और उनके कहे को कोई मतलब ही नहीं बचेगा।सही!आपकी खबर ही ये तय कर देगी कि जो सही है आप वहीं खडे हैं।तो फिर गलत या सही-गलत के बीच फंसने की जरुरत ही क्या है?

अखबारी जगत के तीन मित्रो की तीन कहानियां। ये शॉर्टकट कहानी है। क्योंकि संपादकों के बीच मौजूदा दौर में कहे जाने वाले शब्द और अनकहे शब्दों के बीच रहकर आपको सही गलत का फैसला करना होगा। तो अपने अपने संस्थानों को लेकर पत्रकार मित्रों के बीच संपादकों की इस बैठक को कितना भी लंबा खींचें।

इसी बीच मुझे एक दिन एक पुराने मित्र ने कॉफी पीने का ऐसा आंमत्रण दिया कि मैं चौक गया। यार दो तीन घंटे। कॉफी पीते हुये बात करेंगे। वह तो ठीक है। लेकिन शाम के वक्त दो तीन घंटे। बंधु शॉर्टकट में बतला देना।आखिर में तय यही हुआ कि जहां मुझे लगेगा कि मै बोर हो रहा हूं तो मैं चल दूंगा। शाम छह बजे फिल्म सिटी के सीसीडी पहुंचा। मित्र इंतजार कर रहे थे। बिना भूमिका उसने नब्बे के दशक में हवाला रैकेट के दौर के दस्तावेजों और उस दौर की अखबारमैग्जिन की रिपोर्टिंग दिखाते हुये पूछा कि क्या इस तरह के दस्तावेज अब कोई मायने रखते हैं। बिलकुल मायने रखते हैं। मायने से मेरा मतलब है कि अगर किसी दस्तावेज पर इसी तरह देश के तमाम राजनेताओ के नाम दर्ज हो तो क्या आज की तारीख में कोई मीडिया संस्थान छाप पायेगा? ये क्या मतलब हुआ। अरे यार कोई भी दस्तावेज जांचना चाहिये। गलत भी हो सकता है।

मौजूदा दौर में जब सब कुछ सत्ता में जा सिमटा है तो फिर एक भी गलत खबर या कहें बिना जांचे परखे किसी दस्तावेज को सही कैसे कोई मान लेगा? और तुम खुद ही कह रहे हो कि राजनेताओं को कठघरे में खड़े करने वाले दस्तावेज? जो भी सवाल मेरे जहन में उठे मैंने झटके में कह दिये। लेकिन मेरे ही सवालों को जबाब देकर मित्र ने फिर मुझे कहा…..यार खबर गलत होगी तो हम यहां क्यों बैठे होते? मैं चर्चा क्यों कर रहा होता? जरा कल्पना करो सिस्टम चल कैसे रहा है? आप संस्थानों को टटोलेंगे। आप अधिकारियों से पूछेंगे। आप खबरों की कड़ियों को पकडेंगे। तथ्यों को उनके साथ जोडेंगे और अगर सब सही लगे तब किसी संपादक का क्यों रुख होना चाहिये? तुम ही बताओ कि अगर तुम होते तो क्या करते?

जाहिर है लंबी बहस के बाद ये ऐसा सवाल था जिसका जबाब तुरंत मैं क्या दूं, मेरे जहन में तो मौजूदा दौर के सारे हालात उभरने लगे। मौजूदा हालातों से टकराते उस दौर के हालात भी टकराने लगे, जब सत्ता में एक खामोश पीएम हुआ करते थे। दिल्ली में पत्रकारिता का सुकून ये तो है कि आप सत्ता की चाकरी करने वालों से लेकर सत्ता से टकराते पत्रकारों को बखूबी जान समझ लेते हैं। एक दौर में राडिया। एक दौर में भक्ति। एक दौर में धंधा। एक दौर में संघी। तो क्या इस या उस दौर में पत्रकारिता उलझ चुकी है? या उलझी पत्रकारिता को पहली बार पत्रकार ही सत्ता की गोद में बैठ कर सुलझाने लगे हैं? लेकिन सवाल तो खबर का है और सवाल मुझसे मेरा मित्र क्यों पूछ रहा है? मैंने थाह लेने की कोशिश की, क्यों ये सवाल तो कोई सवाल हुआ नहीं,मुझे अजीब सा लग रहा था ये कौन से हालात हैं?

मैंने जोर से उसकी बात काटते हुये कहा , यार तुम ये सब मुझे कह रहे हो जबकि तुम खुद जिस जगह काम करते हो……वहां के संपादक, वहां का प्रबंधन तो खबरों पर मिट जाने वाले हैं और तुम तो भाग्यशाली हो कि ऐसी जगह काम करते हो जहां खबरों को लेकर कोई समझौता नहीं होता ।

गुरु सही कह रहे हो, लेकिन जरा सोचो हम कर क्या करें। मैंने भी भरोसा दिया, रास्ता निकलेगा और हम मिलकर रास्ता निकालेगें। हम दो चार दिन में फिर मिलते हैं। तुम मुझे भी वो दस्तावेज दिखाओ,मैं भी देखता हूं।
…..अरे यार तुम्हारे ये न्यूज चैनल कितने भी बड़े हो जायें..कितना भी कमा लें लेकिन एक चीज समझ लो देश की सुबह आज भी अखबारों से होती है।
अरे ठीक है यार रात तो चैनलों से होती है। तो तय रहा अगली मुलाकात में
……लेकिन ये लिखते लिखते सोच रहा हूं अब अगली मुलाकात…..तो आप भी इंतजार कीजिए

सरकार की नीतियों पर उंगली उठाना बहुत आसान होता है लेकिन इन सबके बीच काम करना उतना ही मुश्किल हो जाता है। मैं यह नहीं कह रहा कि मोदी सरकार सब कुछ अच्छा कर रही है लेकिन इतना तो कह सकता हूं कि पूर्व की तुलना में बहुत कुछ अच्छा हो रहा है। और जो नहीं हो रहा है उसे करवाने का काम एक जिम्मेदार व्यक्ति होने के नाते मेरा और आपका है। लेकिन इसके लिए लानी होगी सकारात्मक सोच, जिसका आधार भारतीयता हो। मेरे सिर्फ चार सवाल हैं, और जो व्यक्ति पूरी जिम्मेदारी के साथ कह सकता हो कि वह आपके कुनबे का वैचारिक प्रतिनिधित्व करता हैआए और इन सवालों के जवाब दे
क्या जब कोई नेता कुछ गलत और असंवैधानिक काम करता है तो अन्य नेता उसके विरोध में आ ही जाते हैं। हालांकि तब भी नेताओं का एक छोटा सा वर्ग गलत का समर्थन करता है क्योंकि वह स्वयं गलत होता है और उसे पता होता है कि अगर वह चुप रहा और उसके साथीके साथ कुछ हुआ तो उसका निपटना भी तय है।
मुझे गर्व होता है कि मैं उस पेशे से जुड़ा हूं जहां ऐसे लोग हैं जो राष्ट्र को सर्वोपरि मानते हैं। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है और वह लोकतंत्र, भारत का लोकतंत्र है। आखिर क्यों हम भारतीय पत्रकारनहीं हो सकते?
अगर आप पूर्वाग्रही होकर बात करना चाहते हैं तो वाद बेकार है, साथ ही आपसे विवाद करने का भी मेरा कोई मंतव्य नहीं क्योंकि मैं आपका सम्मान करता हूं, भले 

Thursday, September 15, 2016

matter

बालिका शिक्षा जरूरी बताते हुए छात्र- छात्राओं को उच्च शिक्षा से जोड़ने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा है कि बच्चे मेहनत लगन के साथ लक्ष्य बनाकर आगे बढे़ं , जिससे देश समाज का विकास हो।
ऐसे लोगों की कमी नहीं जो अपने समाज के सच्चे नायक हैं। अपनी और किसी ख़ासियत की वजह से नहीं बल्कि देश और समाज के लिए किए गए अपने काम और अपने योगदान की बदौलत वो बन गए रियल हीरोज।
सामाजिक बुराईयां व कुरीतियां देश और समाज को विघटन की और ले जाती है।R2 उन्होनें कहा कि आज की युवा पीढ़ी को यह प्रण करना है कि वे समाज में बढ़ती हुई नशाखोरी,कन्या भ्रूण हत्या और देह व्यापार को जड़ से खत्म करके ही दम लेगें। नशा मनुष्य को शारीरिक व आत्मिक तरीके से कमजोर कर देता है,इसलिए युवाओं को चाहिए कि वह स्वयं भी नशे की गर्त से बचें तथा समाज को भी बचाएं।
छुटपन में जब नया नया साइकिल चलाना सीखा था तब सोचता था, काश कुछ ऐसा हो जाए कि बस एक पैडल मारूं और साइकिल चलती ही चली जाए। जब बड़ा हुआ तो पता चला कि साइकिल फ्रिक्शन के चलते तेज नहीं चलती। फिर दिमाग के घोड़े दौड़े और इस नतीजे पर जा पहुंचे कि इसका समूल नाश करना बेहतर होगा। फिर एकदिन फ्रिक्शन का फायदा समझ में आया। ब्रेक कमजोर होने के चलते साइकिल ठुक गई और पहिया टेढ़ा हो गया।
मनुष्य का प्रधान लक्षण है- स्वाभिमान ।। बल, धन, विद्या, सत्ता आदि सम्पदाओं का अहंकार करना बात दूसरी है, घमण्ड की निन्दा की गई है और उसे पतनकारी दुष्प्रवृत्ति बताया गया है स्वाभिमान इससे सर्वथा भिन्न है ।। आत्म- गौरव एवं आत्म- सम्मान आत्मा की भूख है ।। आत्मा महान् है उसकी महत्ता एवं श्रेष्ठता का वारापार नहीं इसलिए उसे अपने गौरव के अनुरूप परिस्थितियों में ही रहना चाहिए ।। तिरस्कार एवं अपमान की स्थिति उसके लिए न तो वांछनीय ही हो सकती है और न उपयुक्त ही ।। तिरस्कृत रहते हुए भी यों जिन्दगी को जिया जा सकता है ।। अन्न मिलता रहे तो साँस चलती रहेगी पर इससे आत्मिक महानता जीवित नहीं रह सकती उक्के लिए तो स्वाभिमान एवं आत्म- गौरव की रक्षा करने वाली स्थिति ही चाहिए ।।

आत्म- गौरव को सबसे अधिक ठेस पहुँचाने वाली और आत्मा को तत्काल नीचा दिखाने वाली वस्तु हैं- भिक्षा ।। भिखारी तिनके से भी हत्का होता है उनका न कोई सम्मान रहता है और न मूल्य ।। हर व्यक्ति उसे ओछा, गया- गुजरा दीन- दरिद्र एवं अपाहिज असमर्थ समझता है और उसके प्रति तिरस्कार एवं घृणा के भाव रखता है ।। ऐसा सम्मान रहित व्यक्ति अपने आपकी दृष्टि में भी छोटा हो जाता है ।। हीनता एवं दीनता उसकी नस- नस में भर जाती है ।। इन परिस्थितियों में पड़ा हुआ व्यक्ति जीवित ही मृतक है ।।

भिक्षा माँगने का अधिकार केवल दो प्रकार के व्यक्तियों को है एक उनको जो अपाहिज असमर्थ, अन्धे कोढ़ी अशक्त हैं ।। हाथ- पैर इस लायक नहीं कि अपना पेट भरने लायक भी कमा सके ऐसे व्यक्ति को यदि उनके स्वजन सम्बन्धी जीवित रखने लायक सुविधा नहीं देते तो जीवन धारण करने की विवशता में उन्हें भिक्षा माँगने का अधिकार है ।।
देश का हर सचा हिंदू या मुसलमान देश और समाज से ग़द्दारी बर्दाश्त नहीं करेगा। शर्त यह की देश का क़ानून सब के लिए बराबर हो। समाज देश बनाता हे, सियासत नहीं।
समाज में सकारात्मक वातावरण बनाने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका है।
इसलिये पत्रकार के पैरों में चक्कर, जबान में शक्कर,
नई खोज के प्रति दिल में आग और दिमाग में बर्फ होनी चाहिए।
एक नागरिक होने के नाते देश और समाज के प्रति हमारे कई दायित्व हैं, जिसका निर्वहन हर किसी को करना चाहिए। आप भी अपने दायित्व को निभाएं और अपने समाज, शहर और देश के वातावरण को खुशनुमा बनाएं। इसकी शुरुआत हर कोई अपने-अपने स्तर पर कर सकता है।
स्वतंत्रता पाने के लिए उस वक्त हमारे बुजुर्गों ने अपना देश के प्रति अपना दायित्व निभाया, जिसका बेहतर परिणाम आजादी के रूप में मिला, आज हम सुकून से जीवन यापन कर रहे हैं, अब परतंत्रता की वो जंजीरें नहीं हैं, लेकिन शहरी विकास के लिए आज भी जरूरत है एेसे युवाओं की, जो अपना दायित्व निभाए
महापुरूषों के विचारों और जीवन दर्शन के अनुरूप चलकर देश एवं समाज के निर्माण में अहम योगदान दिया जा सकता है।


एकता का अर्थ

एकता का अर्थ यह नहीं होता कि किसी विषय पर मतभेद ही न हो। मतभेद होने के बावजूद भी जो सुखद और सबके हित में है उसे एक रूप में हम सभी स्वीकार कर लेते हैं। एकता का मतलब ही होता हैसब के भिन्न-भिन्न विचार होते हुए भी हम आपसी प्रेमप्यार और भाईचारे के साथ एकजुट एक साथ खड़े रहना । एकता में केवल शारीरिक समीपता ही महत्वपूर्ण नहीं होती बल्कि उसमें मानसिक,बौद्धिक,  वैचारिक और भावात्मक निकटता की समानता आवश्यक है। एकता ही समाज का दीपक है- एकता ही शांति का खजाना है। समाज की एकता के साथ आवश्यकता है- घर की एकतापरिवार की एकता की। क्योंकि जब तक घर की एकता नहीं होगी- तब तक समाजराष्ट्रविश्व की एकता संभव नहीं। एकता ही समाज को विकासशील बना सकती है। इसलिए परिवार की परिभाषा को विस्तृत  बनाये और आपसी मतभेद को मनभेद में तब्दील होने से पूर्व ही उसका उचित समाधान निकाल कर एक माला और उसके मानकों की भांति परिवार को एक मजबूत इकाई का स्वरूप प्रदान करें I संगठन से एकता का जन्म होता है एवं एकता से ही शांति एवं आनंद की वृष्टि होती है।
संगठन ही सर्वोत्कृषष्ट शक्ति है। संगठन ही समाजोत्थान का आधार है। संगठन के बिना  समाज का उत्थान संभव नहीं। एकता के बिना समाज आदर्श स्थापित नहीं कर सकता।क्योंकि एकता ही समाज एवं देश के लिए अमोघ शक्ति हैकिन्तु विघटन समाज के लिए विनाशक शक्ति है। विघटन समाज को तोड़ता है और संगठन व्यक्ति को जोड़ता है। संगठन समाज एवं देश को उन्नति के शिखर पर पहुंचा देता है। आपसी फूट समाज का विनाश कर देती है। धागा यदि संगठित करके एक रस्सी बना ली जाए तो वह हाथी जैसे शक्तिशाली जानवर को भी बांधा जा सकता है। किन्तु यदि वे धागे अलग-अलग रहें तो उससे एक तिनके को भी नहीं बांधा जा सकता  हैं। संगठन ही प्रगति का प्रतीक हैजिस घर में संगठन होता है उस घर में सदैव शांति एवं सुख की वर्षा होती है।
बिखरा हुआ व्यक्ति टूटता है- बिखरा समाज टूटता है- बिखराव में उन्नति नहीं अवनति होती है- बिखराव किसी भी क्षेत्र में अच्छा नहीं। जो समाज संगठित होगाएकता के सूत्र में बंधा होगावह कभी भी परास्त नहीं हो सकता- क्योंकि एकता ही सर्वश्रेष्ठ शक्ति हैकिन्तु जहाँ विघटन हैएकता नहीं है उस समाज पर चाहे कोई भी कमजोर कर देगा।
बहुत बड़े विघटित समाज से छोटा सा संगठित समाज ज्यादा श्रेष्ठ है। इसलिए मेरे प्रिय युवा साथिओं, यदि आप अपने समाज को आदर्श बनाना चाहते हो तो एकता की और कदम बढाओ। जब समाज संगठित, शिक्षित व समृद्ध होगा तो हम सब भी शिक्षित व समृद्ध होंगे I

शिक्षक के रूप में एक विनयशील, अनुशासनबद्ध और आदर्श जीवन पर चलने वाले व्यक्ति

स्वार्थ साधने के चक्कर में कई बार देश, समाज और कानून की परवाह नहीं की जाती। सबसे बड़े रोल मॉडल वे लोग माने जाने लगे हैं जिन्होंने खूब पैसा बनाया है। जिन्होंने किन्हीं मूल्यों के लिए संघर्ष किया है, पर आर्थिक सफलता हासिल की है, उन्हें पूछा नहीं जाता। ऐसे में देश और समाज के लिए मरने-खपने की प्रेरणा कहां से मिलेगी!
शिक्षक का दर्जा समाज में बड़ा ही सम्माननीय तथा उच्च माना गया है। वह नैतिकता व आदर्शों का प्रेरणास्रोत तथा जीवन-मूल्यों के सतत नियामक रूप में भी जाना गया है। शिक्षक के रूप में एक विनयशील, अनुशासनबद्ध और आदर्श जीवन पर चलने वाले व्यक्ति को मान्य किया गया है तथा माना गया है कि उस पर समाज, राष्ट्र तथा मानव जीवन की सभी नैतिक जिम्मेदारियां हैं। समय के साथ ‘गुरु’ के आदर्श रूप की व्यवस्था मिटने लगी है तथा जीवन के दूसरे क्षेत्रों में कार्यरत लोगों की तरह ही शिक्षक भी बनता चला गया। बनता क्यों नहीं, वह भी हाड़-मांस का पुतला है, उसकी भी जिम्मेदारियां तथा महत्त्वाकांक्षाएं हैं। गिरते जीवन-मूल्यों की इस आंधी ने शिक्षक के आदर्श स्वरूप को झिंझोड़ कर रख दिया और आज तो हालत यह है कि शिक्षक जगत में भी भ्रष्टता ने अपना घर बना लिया है।
शिक्षक बनते ही व्यक्ति पर नैतिकता का एक मुलम्मा अपने आप चढ़ जाता है। उसके द्वारा किया जाने वाला हर कार्य आदर्शों की कसौटी पर तोला जाता है और वह हमेशा एक मानसिक दबाव का जीवन जीता है। ईमानदारी और सच्चाई की प्रतिमूर्ति बनकर भी उसे जीना पड़ता है; पर समाज का उसके प्रति जो नजरिया है उसमें रात-दिन का बदलाव आ गया है। मान-सम्मान तथा सेवा-भाव का जो दृष्टिकोण पहले शिक्षकों के प्रति हमारा रहा है, वह सर्वथा नए आयामों में बदल गया है।  भौतिक सुख-सुविधाएं समाज के दूसरे क्षेत्रों के लोग तो ले लें, पर शिक्षक अपनी वही फटीचरी जिंदगी जीता रहे, यह दोयम दर्जे की मानसिकता हमारे लिए घातक रही। जहां तक छात्रों के रवैये का सवाल है, वह बिल्कुल बदल गया है। स्कूल शिक्षक हो या कॉलेज शिक्षक, हर जगह शिक्षक को ही नीचा देखना पड़ रहा है। छात्रों में बढ़ती अनुशासनहीनता, उच्छृंखलता और आए दिन होने वाली हड़तालें, उनके प्रति बढ़ते असंतोष का प्रतीक हैं। श्रद्धाभाव तो तनिक नहीं रहा, बिना गुरु के ज्ञान नहीं मिल सकता, यह बात असत्य मानी जाने लगी है।
जहां तक शिक्षकों में ट्यूशन पढ़ाने के बढ़ते चलन का प्रश्न है, वह प्रासंगिक बन गया है। अल्प वेतन में जिस दायित्व की पूर्ति हम सोचते हैं, वह कतई संभव नहीं है। उसकी भी जरूरतें हैं, दायित्व हैं, बच्चे हैं, उनका लालन-पालन, ब्याह-शादी, जो भी मनुष्य रूप में उसे मिले हैं, उन्हें उसे निभाना ही है। जटिल होते जीवन संघर्ष में यदि वह इस श्रमसाध्य सहारे का आसरा नहीं लेगा तो वह कई मोर्चों पर हार जाएगा। दूसरे क्षेत्रों में जहां भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, कमीशनखोरी तथा लूट-खसोट मची है, वहां शिक्षकों को इस तरह के अवसर बहुत कम हैं। गांव की प्राथमिक शाला में बिना किसी स्कूल बजट के पढ़ा रहे शिक्षक से किस घोटाले की आशंका की जा सकती है? अधिक से अधिक शिक्षक पर यह आरोप आ जाता है कि उसने रुपए लेकर छात्र के अंक बढ़ा दिए या उसे उत्तीर्ण कर दिया, पर यह इतना न्यून है कि वह यहां भी अपने नैतिक व आदर्श स्वरूप को बचाए हुए है। इस दृष्टि से वह जो श्रम करके पैसा कमाता है, उसे किसी भी तरह गलत नहीं कहा जा सकता। समाज में अच्छी बातें कहने व उपदेश देने वाले तो बहुत हैं, पर उन पर अमल करने वाले गिने-चुने हैं। शिक्षक समुदाय में अभी गैरत बची है। अब यह बात दीगर है कि स्कूलों में सरकार की ओर से साधन ही सुलभ न हों तो उसके लिए शिक्षक क्या करें?
जहां तक शिक्षकों द्वारा छात्रों को शिक्षा देने का सवाल है, उसका संबंध हमारे बदलते जीवन मूल्यों से सीधा जुड़ा हुआ है। नए जीवन मूल्यों का असर यह है कि अधिकतर छात्र न तो पढ़ना चाहते हैं और न अभिभावक उन्हें दिशा ज्ञान देना चाहते हैं। सबका जोर सब किसी तरह कोई नौकरी पा लेने पर है, वह चाहे तिकड़म से ही क्यों न मिले। फिर, भी यह बहस जब-तब चलती रहती है कि दिशा ज्ञान देने का दायित्व माता-पिता पर है या शिक्षक पर? सच तो यह है कि यह विवाद ही निरर्थक है, दिशा-ज्ञान देने का दायित्व दोनों पर है। न तो गुरुइससे बच सकता और न ही अभिभावक। आज अभिभावकों के पास समय नहीं है। वे जीविकोपार्जन के अलावा अन्य बातों में इतने उलझ गए हैं कि घर में भौतिकता की आंधी तो ला रहे हैं लेकिन ज्ञान का उजाला कम कर रहे हैं। वे दिन के चौबीस घंटों में से दस मिनट बालक के लिए नहीं निकाल पा रहे। माता-पिता को बच्चे की पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान देना होगा, इस पर गौर करते रहना होगा कि वह पाठ्यक्रम से इतर और क्या-क्या सीख रहा है, उसमें कैसी आदतें विकसित हो रही हैं, उसमें कैसी रुचियां पनप रही हैं, उसकी दिलचस्पी किन विषयों में ज्यादा है।
अगर कोई भटकाव दिखे तो शिक्षक को जानकारी देनी होगी तथा अपने स्तर पर भी उसे दूर करने का प्रयत्न करना होगा। अन्यथा ज्ञान का पाठ पूरा नहीं होगा तथा संस्कारहीनता के कारण उसका सही मार्ग से विचलित हो जाना स्वाभाविक होगा। शिक्षक भी इस मामले में अपनी नैतिक जिम्मेदारी से बचे नहीं होते। उनका जीवन छात्र के लिए दर्पण की तरह होता है जिसमें वह अपना अक्स देखता है। यदि वे ही आदर्श जीवन से हटने लगेंगे तो आगे आने वाली नई पीढ़ी का नागरिक नाकारा तथा संस्कारहीन ही होगा। परिवार बालक की प्रारंभिक व प्राथमिक शाला हो सकता है, पर स्कूली जीवन से जो तमीज, तहजीब और तालीम की दीक्षा उसे दी जाती है, उसका दायित्व उन्हीं का है। उससे बचने का प्रयास उन्हें नहीं करना चाहिए। वे ही यदि छात्रों के साथ खान-पान, रहन-सहन, बोल-चाल तथा उठने-बैठने में व्यवहार की कसौटी नहीं रखेंगे तो वे किस आदर्श की बात करेंगे?
नि:संदेह आज के हालात में शिक्षकों के सिर पर दोहरी जिम्मेदारियां हैं। एक तो स्वयं के स्वरूप को इस भौतिकता की अंधी दौड़ से बचाना, साथ ही छात्र को नई रोशनी में संस्कारशील होने की राह पर ले जाना है।
आज देश में भाषा, क्षेत्र तथा जाति के नाम पर टकराव की प्रवृत्तियां पनप रही हैं। सांप्रदायिक शक्तियां सिर उठा रही हैं, देश के विकास में रोड़े डाल रही हैं। ऐसे में यदि शिक्षक नन्हें नागरिकों को दिशा ज्ञान तथा सामान्य कर्तव्य-बोध के साथ राष्ट्रीयता का पाठ नहीं पढ़ा सकें तो भारत का भविष्य निश्चित ही अंधकारमय है। स्वार्थ लोलुपता तथा निजी, क्षुद्र महत्त्वाकांक्षाओं की लड़ाई में व्यक्ति महत्त्वपूर्ण होता गया है। निजी स्वार्थ साधने के चक्कर में कई बार देश, समाज और कानून की परवाह नहीं की जाती। सबसे बड़े रोल मॉडल वे लोग माने जाने लगे हैं जिन्होंने खूब पैसा बनाया है। जिन्होंने जीवन में कुछ त्याग किया है और किन्हीं मूल्यों के लिए संघर्ष किया है, पर आर्थिक सफलता हासिल की है, उन्हें कहीं पूछा नहीं जाता। ऐसे में देश और समाज के लिए मरने-खपने की प्रेरणा कहां से मिलेगी!
आवश्यकता इस बात की है कि चाहे अतिरिक्त परिश्रम करके ही छात्र को दीक्षित करना पड़े, शिक्षकों को इस ओर सजग रह कर समाज और राष्ट्र के लिए इस महायज्ञ में अपनी आहुति देनी ही होगी। उसके लिए जहां तक आर्थिक दबावों की बात है, वह उसके अभिभावकों से निरंतर संपर्क के जरिए नि:संकोच प्रकट कर देनी चाहिए, क्योंकि यह तो जीवन की आवश्यकता है। घोड़ा घास से यारी करे तो खाए क्या? चाहे गुरुकुल के गुरुजैसा स्वरूप वे न पाएं, पर युगानुकूल परिवर्तन के माध्यम से शिक्षक, छात्र को दायित्वशील नागरिक बनाने का दायित्व तो ले ही सकता है। आज की शिक्षा प्रणाली न तो व्यक्ति को रोजगार सुलभ करा रही और न ही संस्कारवान नागरिक बनाने में मदद कर रही है। ऐसी स्थिति में सहज ही यह सवाल उठता है कि इस शिक्षा प्रणाली की सार्थकता और प्रासंगिकता क्या है।
शिक्षक वेतन पाते हैं तो उसका मेहनताना वे शिक्षार्थी को ज्ञान की राह बता कर चुका सकते हैं। यहां शिक्षकों के लिए आचरण संहिता में बांधने जैसी कोई बात नहीं है, पर जिस तरह का यह पेशा है, उसमें नैतिकता को नकारा नहीं जा सकता। छात्रों के व्यक्तित्व-निर्माण की जिम्मेदारियों से शिक्षक बच नहीं सकता। बिगड़े हुए इस माहौल में कोई रास्ता निकालना ही होगा, जिससे देश के भविष्य पर मंडरा रहे संकट को दूर किया जा सके। आज छात्रों में माता-पिता, गुरु, राष्ट्र किसी के प्रति कोई श्रद्धाभाव नहीं है। शायद इसका कारण यही है कि उनमें जो प्रारंभिक संस्कारों तथा मानव मूल्यों का बीजारोपण होना चाहिए था, वह नहीं हुआ तथा वे ऐसी छाया तले पलते रहे, जिसमें अनुशासनहीनता व उच्छृंखलता की खाद मिली हुई थी। टीवी तथा फिल्मों के साथ आई नई मनोरंजन संस्कृति ने भी व्यक्ति को आदर्श से भटकाया है तथा गलत-सही की परख का बोध कुंद किया है। संवेदनशीलता का चतुर्दिक क्षरण हुआ है। हर तरफ बढ़ रही हिंसा और नैतिक गिरावट के मूल में यही बात है। इसलिए इस क्षरण को रोकना है और समाज को नैतिक पतन से बचाना है, तो सबसे पहले शिक्षा पर ध्यान देना होगा। यह सिर्फ शैक्षिक बजट का मामला नहीं है। असल सवाल यह है कि शिक्षा हासिल करने के बाद इंसान में क्या फर्क आता है। क्या वह बेहतर इंसान और देश व समाज के प्रति जिम्मेदार नागरिक बनकर निकलता है?

युवा समाज की रीढ़ होती है.

यूवा शक्ति देश और समाज की रीढ़ होती है. युवा देश और समाज को नए शिखर पर ले जाते हैं. युवा देश का वर्तमान हैं, तो भूतकाल और भविष्य के सेतु भी हैं. युवा देश और समाज के जीवन मूल्यों के प्रतीक हैं.  युवा गहन ऊर्जा और उच्च महत्वकांक्षाओं से भरे हुए होते हैं. उनकी आंखों में भविष्य के इंद्रधनुषी स्वप्न होते हैं. समाज को बेहतर बनाने और राष्ट्र के निर्माण में सर्वाधिक योगदान युवाओं का ही होता है. देश के स्वतंत्रता आंदोलन में युवाओं ने अपनी शक्ति का परिचय दिया था. 

भारत एक विकासशील और बड़ी जनसंख्या वाला देश है. यहां आधी जनसंख्या युवाओं की है. देश की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या की आयु 35 वर्ष से कम है. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है. यहां के लगभग 60 करोड़ लोग 25 से 30 वर्ष के हैं. यह स्थिति वर्ष 2045 तक बनी रहेगी. विश्व की लगभग आधी जनसंख्या 25 वर्ष से कम आयु की है. अपनी बड़ी युवा जनसंख्या के साथ भारत अर्थव्यवस्था नई ऊंचाई पर जा सकता है. परंतु इस ओर भी ध्यान देना होगा कि आज देश की बड़ी जनसंख्या बेरोजगारी से जूझ रही है. भारतीय संख्यिकी विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार देश में बेरोजगारों की संख्या लगातार बढ़ रही है. देश में बेरोजगारों की संख्या 11.3 करोड़ से अधिक है. 15 से 60 वर्ष आयु के 74.8 करोड़ लोग बेरोजगार हैं, जो काम करने वाले लोगों की संख्या का  15 प्रतिशत है. जनगणना में बेरोजगारों को श्रेणीबद्ध करके गृहणियों, छात्रों और अन्य में शामिल किया गया है. यह अब तक बेरोजगारों की सबसे बड़ी संख्या है. वर्ष 2001 की जनगणना में जहां 23 प्रतिशत लोग बेरोजगार थे, वहीं 2011 की जनगणना में इनकी संख्या बढ़कर 28 प्रतिशत हो गई. बेरोजगार युवा हताश हो जाते हैं. ऐसी स्थिति में युवा शक्ति का अनुचित उपयोग किया जा सकता है. हताश युवा अपराध के मार्ग पर चल पड़ते हैं. वे नशाख़ोरी के शिकार हो जाते हैं और फिर अपनी नशे की लत को पूरा करने के लिए अपराध भी कर बैठते हैं. इस तरह वे अपना जीवन नष्ट कर लेते हैं. देश में हो रही 70 प्रतिशत आपराधिक गतिविधियों में युवाओं की संलिप्तता रहती है.

देखने में आ रहा है कि युवाओं में नकारात्मकता जन्म ले रही है.  उनमें धैर्य की कमी है. वे हर वस्तु अति शीघ्र प्राप्त कर लेना चाहते हैं. वे आगे बढ़ने के लिए कठिन परिश्रम की बजाय शॊर्टकट्स खोजते हैं. भोग विलास और आधुनिकता की चकाचौंध उन्हें प्रभावित करती है. उच्च पद, धन-दौलत और ऐश्वर्य का जीवन उनका आदर्श बन गए हैं. अपने इस लक्ष्य को प्राप्त करने में जब वे असफल हो जाते हैं, तो उनमें चिड़चिड़ापन आ जाता है. कई बार वे मानसिक तनाव का भी शिकार हो जाते हैं. युवाओं की इस नकारत्मकता को सकारत्मकता में परिवर्तित करना होगा.

यदि युवाओं को कोई उपयुक्त कार्य नहीं दिया गया, तब मानव संसाधनों का भारी राष्ट्रीय क्षय होगा. उन्हें किसी सकारात्मक कार्य में भागीदार बनाया जाना चाहिए. यदि इस मानव शक्ति की क्रियाशीलता को देश की विकास परियोजनाओं में प्रयुक्त किया जाए, तो यह अद्भुत कार्य कर सकती है. जब भी किसी चुनौती का सामना करने के लिए देश के युवाओं को पुकारा गया, तो वे पीछे नहीं रहे. प्राकृतिक आपदाओं के समय युवा आगे बढ़कर अपना योगदान देते हैं, चाहे भूकंप हो या बाढ़. युवाओं ने सदैव पीड़ितों की सहायता में दिन-रात परिश्रम किया.

युवाओं के उचित मार्गदर्शन के लिए अति आवश्यक है कि उनकी क्षमता का सदुपयोग किया जाए.  उनकी सेवाओं को प्रौढ़ शिक्षा तथा अन्य सराकारी योजनाओं के तहत चलाए जा रहे अभियानों में प्रयुक्त किया जा सकता है. वे सरकार द्वारा सुनिश्चित लक्ष्यों की प्राप्ति के दायित्व को वहन कर सकते हैं. तस्करी, काला बाजारी, जमाखोरी जैसे अपराधों पर अंकुश लगाने में उनकी सेवाएं ली जा सकती हैं. युवाओं को राष्ट्र निर्माण के कार्य में लगाया जाए. राष्ट्र निर्माण का कार्य सरल नहीं है. यह दुष्कर कार्य है. इसे एक साथ और एक ही समय में पूर्ण नहीं किया जा सकता. यह चरणबद्ध कार्य है. इसे चरणों में विभाजित किया जा सकता है. युवा इस श्रेष्ठ कार्य में अपनी क्षमता और योग्यता के अनुसार भाग ले सकते हैं. ऐसी असंख्य योजनाएं, परियोजनां और कार्यक्रम हैं, जिनमें युवाओं की सहभागिता सुनिश्चत की जा सकती है. युवा समाज में समाजिक, आर्थिक और नवनिर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. वे समाज में प्रचलित कुप्रथाओं और अंधविश्वास को समाप्त करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं. देश में दहेज प्रथा के कारण न जाने कितनी ही महिलाओं पर अत्याचार किए जाते हैं, यहां तक कि उनकी हत्या तक कर दी जाती है. महिलाओं के प्रति यौन हिंसा से तो देश त्रस्त है. नब्बे साल की वॄद्धाओं से लेकर कुछ दिन की मासूम बच्चियों तक से दुष्कर्म कर उनकी हत्या कर दी जाती है. डायन प्रथा के नाम पर महिलाओं की हत्याएं होती रहती हैं. अंधविश्वास में जकड़े लोग नरबलि तक दे डालते हैं. समाज में छुआछूत, ऊंच-नीच और जात-पांत की खाई भी बहुत गहरी है. दलितों विशेषकर महिलाओं के साथ अमानवीयता व्यवहार की घटनाएं भी आए दिन देखने और सुनने को मिलती रहती हैं, जो सभ्य समाज के माथे पर कलंक समान हैं. आतंकवाद के प्रति भी युवाओं में जागृति पैदा करने की आवश्यकता है. भविष्य में देश की लगातार बढ़ती जनसंख्या का पेट भरने के लिए अधिक खाद्यान्न की आवश्यकता होगी. कृषि में उत्पादन के स्तर को उन्नत करने से संबंधित योजनाओं में युवाओं को लगाया जा सकता है. इससे जहां युवाओं को रोजगार मिलेगा, वहीं देश और समाज हित में उनका योगदान रहेगा.

केवल राष्ट्रीय युवा दिवस मनाकर स्वामी विवेकानन्द जी के स्वप्न को साकार नहीं किया किया जा सकता और न ही युवाओं के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह किया जा सकता है. उल्लेखनीय है कि विश्व के अधिकांश देशों में कोई न कोई दिन युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है. संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार वर्ष 1985 को अंतरराष्ट्रीय युवा वर्ष घोषित किया गया.  पहली बार वर्ष 2000 में अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस का आयोजन आरंभ किया गया था. संयुक्त राष्ट्र ने 17 दिसंबर 1999 को प्रत्येक वर्ष 12 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी. अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस मनाने का अर्थ है कि सरकार युवा के मुद्दों और उनकी बातों पर ध्यान आकर्षित करे. भारत में इसका प्रारंभ वर्ष 1985 से हुआ, जब सरकार ने स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस पर अर्थात 12 जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की. युवा दिवस के रूप में स्वामी विवेकानन्द का जन्मदिवस चुनने के बारे में सरकार का विचार था कि स्वामी विवेकानन्द का दर्शन एवं उनका जीवन भारतीय युवकों के लिए प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत हो सकता है. इस दिन देश भर के विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में कई प्रकार के कार्यक्रम होते हैं, रैलियां निकाली जाती हैं, विभिन्न प्रकार की स्पर्धाएं आयोजित की जाती है, व्याख्यान होते हैं तथा विवेकानन्द साहित्य की प्रदर्शनियां लगाई जाती हैं.
स्वामी विवेकानंद ने युवाओं का आह्वान करते हुए कठोपनिषद का एक मंत्र कहा था-
 'उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।'
अर्थात उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक कि अपने लक्ष्य तक न पहुंच जाओ.'

निसंदेह, युवा देश के विकास का एक महत्वपूर्ण अंग है. युवाओं को देश के विकास के लिए अपना सक्रिय योगदान प्रदान करना चाहिए. समाज को बेहतर बनाने और राष्ट्र निर्माण के कार्यों में युवाओं को सम्मिलित करना अति महत्वपूर्ण है तथा इसे यथाशीघ्र एवं व्यापक स्तर पर किया जाना चाहिए. इससे एक ओर तो वे अपनी सेवाएं देश को दे पाएंगे, दूसरी ओर इससे उनका अपना भी उत्थान होगा.

Wednesday, September 14, 2016

जाति-धर्म या संप्रदाय या ऊंच-नीच के फर्जी भाव में बह कर उन्हें मार डालने की बर्बरता कहां से आती है?

कुछ दिन पहले सुबह मां का फोन आया तो लगा कि आम दिनों की तरह शुभकामना देने और हालचाल जानने के लिए ही होगा। मगर वे रुंधे गले और सिसकियों के साथ बोल रही थीं। पूछने पर उन्होंने जो बताया उससे मेरी भी आंखें नम हो गर्इं, लेकिन समाज की मानसिकता और उसकी रिवायतों को लेकर मन गुस्से से भर गया। मेरी मां जिस स्कूल में पढ़ाती हैं, वहां मिड-डे मील यानी दोपहर का भोजन बनाने के लिए दो महिला कर्मचारी नियुक्त हैं। उन्हीं में से एक के तेईस साल के बेटे की हत्या कर दी गई थी। मेरी मां वहां अकेली रहती हैं और कई तरह के काम में मदद के लिए उनकी काफी निर्भरता उस लड़के पर थी। स्टेशन पर पहुंचाने जाना हो, डॉक्टर को दिखाना हो या फिर बैंक या बिजली-बत्ती का काम हो, उसे हमने हमेशा मां के साथ खड़ा पाया था, घर के सदस्य की तरह। उसकी हत्या ने मां को झकझोर कर रख दिया था। उस लड़के की गलती महज इतनी थी कि वह किसी लड़की से प्रेम करता था। पता चलने के बाद बात करने के बहाने से उस लड़के को लड़की के घर वालों ने रात में बुलाया और पीट-पीट कर मार डाला। लड़की को एक कमरे में बंद रखा गया था। इस घटना के बाद काफी हंगामा मच गया और बहुत सारे लोगों ने लड़की के घर पर धावा बोल दिया। सारे लोग तो भाग गए, लेकिन सदमे में पड़ी वह लड़की नहीं निकल सकी। हत्या का बदला लेने पर उतारू भीड़ को उसके सदमे से कोई मतलब नहीं था। उसे घसीट कर बाहर लाया गया, उसके कपड़े फाड़ डाले गए। जबकि अपने साथ इतना होने के बावजूद उस लड़की ने पुलिस में अपने घर वालों के खिलाफ बयान दिया था।
घटना का ब्योरा सुन कर मुझे लगा कि मैं खूब जोर से चीख-चीख कर रोऊं, अपने आसपास की सारी चीजों को तोड़फोड़ डालूं। मैंने मां को किसी तरह शांत किया, लेकिन उसके बाद मन पूरी तरह बेचैन हो गया था। एक झटके में 2007 के मनोज-बबली की हत्या के मामले से लेकर फर्जी इज्जत के नाम पर की जाने वाली इस तरह की हत्या की तमाम घटनाएं एक रील की तरह दिमाग में चलने लगीं। सोनी नाम की उस लड़की की हत्या का ध्यान आया, जिसने हाल ही में ट्रेन के बाथरूम में अपने मोबाइल से अंतिम वीडियो बना कर परिवारजनों द्वारा अपनी हत्या की आशंका जताई थी। अगले ही दिन उसका यह डर सच में बदल गया था।
अंतरजातीय परिवार या कई बार स्वजातीय भी, अगर लड़के या लड़की की पसंद से जुड़ा संबंध है तो बात उनकी जान लेने तक आ जाती है। बिहार से लेकर पंजाब, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु हर जगह अनगिनत मनोज और बबली की चीखें दफ्न हैं। सब कुछ आधुनिक होता गया है। लेकिन पिछले दस या बीस सालों की आधुनिकता के दंभ के बीच भी कुछ नहीं बदला है। स्टेटस यानी हैसियत, जाति, धर्म के नाम पर परिवार और समाज अपने ही बच्चों को मारने से गुरेज नहीं कर रहा। जो लोग जाति या धर्म के नाम पर प्रेम संबंधों के खिलाफ इस तरह की मार-काट मचाते हैं, क्या वे अपनों का खून बहा कर अपनी जाति या धर्म की रक्षा कर लेते हैं? यह कौन-सी मर्यादा है जो हत्या कर देने से बच जाती है?
कुछ परिवार ऐसे प्रेम संबंध में बच्चों की हत्या तो नहीं करते हैं, लेकिन उन्हें आजीवन स्वीकृति नहीं दे पाते हैं। इसके पीछे भी मानसिकता में वही जाति-धर्म या ऊंच-नीच की पिछड़ी हुई भावनाएं बैठी होती हैं। अगर किन्हीं हालात में माता-पिता या परिवार को लगता है कि बच्चों का चुनाव गलत है तो खुल कर बात की जा सकती है। उन्हें भविष्य की परिस्थितियों से अवगत करा कर उनकी तैयारी में कमियां बताई जा सकती हैं। जीवन में प्रेम के अलावा सही जीवन जीने के लिए पैरों पर खड़े होने की अहमियत बताई जा सकती है। लेकिन जाति-धर्म या संप्रदाय या ऊंच-नीच के फर्जी भाव में बह कर उन्हें मार डालने की बर्बरता कहां से आती है? क्या इसका सिरा आखिरकार स्त्रियों को गुलाम बनाने वाली व्यवस्था को मजबूत करने से नहीं जुड़ता है?
सवाल है कि क्या अपनी पसंद से जीवन साथी का चयन अपराध है? संविधान ने इसका अधिकार दिया है। जातिगत दुराव और मतभेद को दूर करने के लिए कई राज्य सरकारों ने अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा दिया है। ऐसे जोड़ों को आर्थिक प्रोत्साहन भी दिया जाता है। लेकिन समाज और परंपरा जान लेकर यह अधिकार छीन लेते हैं। कोई भी सरकार ऐसी कुंठा से समाज को मुक्त नहीं कर सकी है, क्योंकि खुद समाज भी शायद इस सड़ांध में जकड़े रहना चाहता है! दरअसल, हम चाहे कितना भी आधुनिक और विकासवादी होने का दावा कर लें, मगर हम एक बेहद सामंती और पिछड़ी हुई जातिगत मानसिकता की जंजीर में जकड़े हुए हैं।