Tuesday, October 4, 2016

रैगर समाज समाज के चतुर्मुखी विकास के लिए विभिन्न आयामो का समय - समय पर आयोजन करता है |

रैगर समाज समाज के चतुर्मुखी विकास के लिए विभिन्न आयामो का समय - समय पर आयोजन करता है |
व्यक्ति को जीवन में अनेक प्रकार कि चुनौतियो का सामना करना पड़ता है | ये चुनौतियां हमारे लिए एक प्रकार का उपहार लेकर आती है | जीवन कि इन चुनौतियों को साहस के साथ स्वीकारने एवं उसकी बाधाओं को पार करने पर हमें सफलता रूपी उपहार मिलता है किन्तु इसके विपरीत हताशा / निराशा के कारण चुनौतियों का सामना करने से पीछे हट जाने से असफलता के कारण जीवन अंधकारमय लगने लगता है |
किसी कार्य को करने के लिए जितना अधिक संघर्ष करना पड़ता है परिणाम की सफलता उतनी ही शानदार होती है | चुनौतियां जलते हुए अंगारा होती है | सोना शुद्ध करने के लिए अग्नि में तपाया जाता है | तपने के बाद शुद्ध सोने कि प्राप्ति होती है | इसी प्रकार कठिनाइयों से तपा हुआ व्यक्ति सफलता के बाद पूर्ण व्यतित्व का आयाम लेकर समाज को सुन्दर दिशा देता है |
कार्य कि सफलता में दो मुख्य निर्धारक है - (1) अवसर कि परख (२) उपुक्त समय पर निर्णय लेना | प्रायः लोग सही अवसर पर कार्य नहीं करते हैं | अतः सफलता हाथ नहीं है | निर्णय कि क्षमता समय के साथ होने से सदैव सफलता कदम चूमती है | इसके अतिरिक्त दूरदर्शिता एवं ततउत्पन्न मति भी सफलता के लिए उत्प्रेरक का कार्य करती है |

आवश्यक एवं अनिवार्य रूप से स्मरणीय रहे कि सदैव प्रत्येक कार्य कि सफलता भी अनर्थकारी सिद्ध होती है | प्रत्येक कार्य कि सफलता मनुष्य को अहंकारी एवं कुपतिगामी होने के लिए प्रेरित करती है | अतः यदा - कदा सफलता के मोड़ पर पहुंचना आवश्यक है ऐसे समय में व्यक्ति आध्यात्मिक एवं ईश्वर सत्ता का बोध करता है जिसके द्वार सृजन हेतु खुलते हैं |

आर्यभट्ट एवं शून्य के आविष्कार से सम्बंधित भ्रान्ति (Zero in india)

आज कल हिन्दू संस्कृति विरोधीयों ने एक जोक फैलाया है की जब आर्यभट्ट ने शून्य की खोज 500 ईसवीं के लगभग की तो 100 कौरवों और रावण के 10 सर की गिनती किसने की???
◆◆आर्यभट्ट ने शून्य की खोज अपने द्वारा अविष्कृत अक्षरांक पद्धति में किया है न की सभी पद्धतियों में।ठीक उसी प्रकार जैसे किताब को अंग्रेज बुक लिखते हैं इसलिए बुक की खोज करने वाले अंग्रेज हुए मगर उसी को किताब के रूप में किसी और ने खोजा ...
◆◆आविष्कार और शोध में अंतर है । शोध निरंतर चलने वाली एक प्रक्रिया है जबकि आविष्कार नितांत नवीन और अभूतपूर्व होता है । यूँ मेटाफ़िज़िक्स की दृष्टि से देखें तो अभूतपूर्व भी कुछ नहीं होता । सब कुछ रिपीट होता है, बस केवल हमारे सामने जो पहली बार प्रकट होता है हम उसे आविष्कार मान लेते हैं । अग्नि बाण पहले भी थे ... आज भी हैं । बीच के काल में नहीं थे । सभ्यताओं के उदय और अस्त के साथ इन सब चीजों का भी उदय-अस्त होता रहता है । उदय-अस्त का अर्थ केवल एपियरेंस एण्ड डिसएपियरेंस भर है । सूर्य अस्त होने के बाद भी समाप्त नहीं हो जाता । शून्य के अस्तित्व के बिना स्थापत्य कला, विज्ञान, दर्शन आदि के विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती । यह सबसे बड़ा प्रमाण है कि शून्य का अस्तित्व वैदिक काल से भी पूर्व का है ।
◆◆आर्यभट्ट (जन्म 476 ई.) को शून्य का आविष्कारक नहीं माना जा सकता। आर्यभट्ट ने एक नई अक्षरांक पद्धति को जन्म दिया था। उन्होंने अपने ग्रंथ आर्यभटीय में भी उसी पद्धति में कार्य किया है। आर्यभट्ट को लोग शून्य का जनक इसलिए मानते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने ग्रंथ आर्यभटीय (498 ई.) केगणितपाद 2 में एक से अरब तक की संख्याएं बताकर लिखाहै 'स्थानात् स्थानं दशगुणं स्यात' मतलब प्रत्येक अगली संख्या पिछली संख्या से दस गुना है। उनके ऐसे कहने से यह सिद्ध होता है कि निश्चित रूप से शून्य का आविष्कार आर्यभट्ट के काल से प्राचीन है।
◆◆पिंगलाचार्य भारत में लगभग 200 से 500ईसा पूर्व के बीच छंद शास्त्र के प्रणेता पिंगलाचार्य हुए हैं (चाणक्य के बाद) जिन्हें द्विअंकीय गणित का भी प्रणेता माना जाता है। इसी काल में पाणिनी हुए हैं जिनको संस्कृत का व्याकरण लिखने का श्रेय जाता है। अधिकतर विद्वान पिंगलाचार्य कोशून्यका आविष्कारकमानते हैं।पिंगलाचार्य के छंदों के नियमों को यदि गणितीय दृष्टि से देखें तो एक तरह से वे द्विअंकीय (बाइनरी) गणित का कार्य करते हैं और दूसरी दृष्टि से उनमें दो अंकों के घन समीकरण तथा चतुर्घाती समीकरण के हल दिखते हैं। गणित की इतनी ऊंची समझ के पहले अवश्य ही किसी ने उसकी प्राथमिक अवधारणा को भीसमझा होगा। अत: भारत में शून्य की खोज ईसा से 200 वर्ष से भी पुरानी हो सकती है।
◆◆ बख्शाली पाण्डुलिपि :गणित के एक बहुमूल्य ग्रंथ बख्शाली पाण्डुलिपि के कुछ (70) पन्ने सन् 1881 में खैबर क्षेत्र में बख्शाली गांव के निकट बहुत हीजीर्ण अवस्था में मिले थे। ये भोजपत्र पर लिखे गए हैं। इनकी भाषा के आधार पर अधिकांश विद्वान इन्हें 200 ईसा पूर्व से 300 ईस्वी का मानते हैं। यह ग्रंथ इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह शुल्व सूत्री (वैदिक) गणित के ईसा पूर्व 800 से लेकर ईसा पूर्व 500 के काल के बाद के गणितीय रूप को दर्शाता है। इस पाण्डुलिपि में शून्य का जिक्र है।भारत में उपलब्ध गणितीय ग्रंथों में 300 ईस्वी पूर्व का भगवती सूत्र है जिसमें संयोजन पर कार्य हैतथा 200 ईस्वी पूर्व का स्थनंग सूत्र है जिसमें अंक सिद्धांत, रेखागणित, भिन्न, सरल समीकरण, घन समीकरण, चतुर्घाती समीकरण तथा मचय (पर्मुटेशंस) आदिपर कार्य हैं। सन् 200 ईस्वी तक समुच्चय सिद्धांत के उपयोग का उल्लेख मिलता है और अनंत संख्या पर भी बहुत कार्य मिलता है।
◆◆ ईशावास्योपनिषद् के शांति मंत्र में कहा गया है-ॐपूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुदच्यते।पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।यह मंत्र मात्र आध्यात्मिक वर्णन नहीं है, अपितु इसमें अत्यंत महत्वपूर्ण गणितीय संकेत छिपा है, जो समग्र गणित शास्त्र का आधार बना। मंत्र कहता है, यह भीपूर्ण है, वह भी पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण की उत्पत्ति होती है, तो भी वह पूर्ण है और अंत में पूर्ण में लीन होने पर भी अवशिष्ट पूर्ण ही रहता है। जो वैशिष्ट्य पूर्ण के वर्णन में है वही वैशिष्ट्य शून्य व अनंत में है। शून्य में शून्य जोड़ने या घटाने पर शून्य ही रहता है। यही बात अनन्त की भी है।हमारे यहां जगत के संदर्भ में विचार करते समय दो प्रकार के चिंतक हुए। एक इति और दूसरा नेति। इति यानी पूर्णता के बारे में कहने वाले। नेति यानी शून्यता केबारे में कहने वाले। यह शून्य का आविष्कार गणना की दृष्टि से, गणित के विकास की दृष्टि से अप्रतिम रहा है।भारत गणित शास्त्र का जन्मदाता रहा है, यह दुनिया भी मानने लगी है।
◆◆यूरोप की सबसे पुरानी गणित की पुस्तक"कोडेक्स विजिलेन्स" है। यह पुस्तक स्पेन की राजधानी मेड्रिड के संग्राहलय में रखी है। इसमें लिखा है-"गणना के चिन्हों से (अंकों से) हमें यह अनुभव होता है कि प्राचीन हिन्दुआें की बुद्धि बड़ी पैनी थी तथा अन्यदेश गणना व ज्यामिति तथा अन्य विज्ञानों में उनसे बहुत पीछे थे। यह उनके नौ अंकों से प्रमाणित हो जाता है, जिनकी सहायता से कोई भी संख्या लिखी जा सकती है।"नौ अंक और शून्य के संयोग से अनंत गणनाएं करने की सामर्थ्य और उसकी दुनिया के वैज्ञानिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका की वर्तमान युग के विज्ञानी लाप्लास तथा अल्बर्ट आईंस्टीन ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की है।
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स्रोत: गूगल ब्लॉग,कौशलेन्द्रम मिश्र अतिदलित जी,आशुतोष की कलम से....

कलम की दास्तान

यह कलम, ये पन्ने,
ये ख्वाब, और ये सपने
सब काफिर हैं.
जीने को मुतआस्सिर हैं.
जी हाँ! मैं एक काफिर हूँ. मेरा कोई भगवान नहीं है, कोई खुदा नहीं है. मैं तो सिर्फ उन ख़्वाबों और ख्यालों के सहारे जिंदा हूँ जो मुझे रोज़ नींद से जगाते हैं. कईओं की हाथों की मेहंदी और कईओं के आँखों का सूरमा हूँ मैं. चाँद से टपकी पिघली हुई रौशनी से सीली वो रात हूँ मैं. मैं ज्ञात हूँ और अज्ञात भी हूँ. मैं उस ख़त में लिखी वह धुंधली सी बात हूँ. मैं लफ्ज़ हूँ, मैं सदियों पुरानी हूँ लेकिन फिर भी सब्ज़ हूँ.
मैं वह हथियार हूँ जो खून नहीं बहाता, मैं वह हथियार हूँ जो शायद खून को बहने से बचा सके.
बोलो! है कोई मेरे जैसा?
मैं एक कलम हूँ.
इतिहास, वर्तमान और भविष्य का मूल.
लेखक मेरे प्रेमी हैं. ग़ालिब से लेकर प्लेटो, सब मेरी खूबसूरती के कायल रह चुके हैं. सदियों से सिरों को ऊपर उठाने और उनकी गर्दनों को मज़बूत बनाने का काम किया है मैनें. लोगों की आवाज़ को ताकत देकर सारे विश्व तक पहुंचाया है मैनें. मेरे कई रूप हैं. कभी गांधी की विनम्रता बनी हूँ तो कभी हिटलर की नफरत. कभी टैगोर की कविताएँ तो कभी मंटो की कहानियां!
कभी किसी की जेब में सजती हूँ तो कभी किसी के कान पर.
भगवान बनकर धर्म लिखे हैं मैंने. सियासतें उठाई और गिराई हैं.
कभी ख़त लिखे तो कभी कसीदे. लेकिन थकी नहीं. बस कर्म करती गई!
फेंकी गई हूँ, गली-कूचों से उठाई गयी हूँ!
इस दुनिया को बखूबी मेरी पहचान पता है. बस मेरे अरमान नहीं पता.
लोग कहते हैं कि आज की आधुनिक दुनिया में मेरी एहमियत काफी कम हो गयी है. लेकिन मेरा मानना कुछ अलग है. मेरी आज भी इज्ज़त की जाती है और मुझे पूरा भरोसा है कि इसी तरह मेरी इज्ज़त की जायेगी. मैं ज़्यादा कुछ नहीं मांगती, बस तुम्हारी मेज़ का एक कोना और थोड़ी सी इज्ज़त. और बस  ख्यालों को मरने मत दो, नहीं तो मेरे अस्तित्व का क्या फायदा?
कल फिर उठाई जाऊँगी मैं. कल फिर कुछ पन्नों को सजाऊँगी.
कल फिर मैं कलम कहलाऊँगी.
पन्ने वही हैं,
कलम भी वही है.
बस सफ्हे नए होंगे.
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आपके प्यार और स्नेह का आशीर्वाद मिलता रहे
दो में से क्या तुम्हे चाहिए कलम या कि तलवार
मन में ऊँचे भाव कि तन में शक्ति विजय अपार
अंध कक्ष में बैठ रचोगे ऊँचे मीठे गान
या तलवार पकड़ जीतोगे बाहर का मैदान
कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगाने वाली,
दिल की नहीं दिमागों में भी आग लगाने वाली
पैदा करती कलम विचारों के जलते अंगारे,
और प्रज्वलित प्राण देश क्या कभी मरेगा मारे
एक भेद है और वहां निर्भय होते नर -नारी,
कलम उगलती आग, जहाँ अक्षर बनते चिंगारी
जहाँ मनुष्यों के भीतर हरदम जलते हैं शोले,
बादल में बिजली होती, होते दिमाग में गोले
जहाँ पालते लोग लहू में हालाहल की धार,

क्या चिंता यदि वहाँ हाथ में नहीं हुई तलवार

कविता -2

कुछ ऐसे पिसे ज़रूरतों की चक्की में,
खुदको पीछे छोड़ आये.. अपनों की तरक्की में|
मुद्दत का थका हुआ था, तो आख लग गयी,
सारा मंज़र ही बदल गया.. एक झपकी में|
कुछ ऐसे पिसे ज़रूरतों की चक्की में…
रिश्ता धुंधला गया, वक़्त के कोहरे में,
खबर ए रुखसत निगल गए.. एक सिसकी में|
कुछ ऐसे पिसे ज़रूरतों की चक्की में…
जाने किस दाग से आह निकली है ‘वीर’,
कई नाम लिखे हैं मेरी इस हिचकी में|
खामोश ज़हन में कैद बेचैनी है,
हमने लबों पे मुस्कुराहट पहनी है|
मत करो ज़ाया अपने जज़्बात तुम,
तकलीफ मेरी मुझे ही सहनी है|
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जिसकी इजाज़त दिल न दे.. वो काम मत कीजिये,
इन हाथों से अपना खेल तमाम मत कीजिये|
बेसबब नहीं होता.. कुछ भी यहाँ,
खुद से गद्दारी का ये काम मत कीजिये|
जिसकी इजाज़त दिल न दे.. वो काम मत कीजिये|
डर्र हो या मोहब्बत हो किसी से,
अपनी शक्सियत को दुसरे का गुलाम मत कीजिये|
जिसकी इजाज़त दिल न दे.. वो काम मत कीजिये|
खुदा ने बड़ी नेमतों से बख्शी है जिंदिगी,
अपनी रूह की सुनिये.. इसे हराम मत कीजिये|
जिसकी इजाज़त दिल न दे.. वो काम मत कीजिये|
जूनून की हवा दीजिये अपने इरादों को,
और फिर एक लम्हे का भी आराम मत कीजिये|
जिसकी इजाज़त दिल न दे.. वो काम मत कीजिये|
न दीजिये कभी उन मजबूरियों का हवाला,
अपने होसलों का नाम बदनाम मत कीजिये|
जिसकी इजाज़त दिल न दे.. वो काम मत कीजिये|
संभाल कर रखिये अपने दर्द सीने में,
हमसे कहिये.. इन्हें चर्चा ए आम मत कीजिये|
जिसकी इजाज़त दिल न दे.. वो काम मत कीजिये|
ऐसे जियो की आखरी सांस भी मुक्कमल हो,
आधे अधूरे से कोई भी काम मत कीजिये|
जिसकी इजाज़त दिल न दे.. वो काम मत कीजिये|
खुद तक जाता ये सफ़र क़ायम रहे,
किसी मील के पत्थर को मकाम मत कीजिये|
जिसकी इजाज़त दिल न दे.. वो काम मत कीजिये|
एक पल भी कज़ा (मौत) मोहलत नहीं देगी,
यूँ बरबाद अपने सुबह शाम मत कीजिये|
जिसकी इजाज़त दिल न दे.. वो काम मत कीजिये|
आईने से बड़ा कोई मज़हब नहीं है,
चंद किताबों का इतना एहतराम मत कीजिये|
जिसकी इजाज़त दिल न दे.. वो काम मत कीजिये|
न जाने किस मोड़ पर फिर मुलाकात हो ‘वीर’,
किसी से भी आखरी सलाम मत कीजिये|
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ये खुदा तेरे बन्दों में इतनी रहमत रखना,
कुछ नहीं, पर इंसानियत बरक़रार रखना।
परिंदो से अमन की तलाश जारी रखना,
भाईचारें के कुछ एक दीपक जलाए रखना।
बिके ज़मीर किसीका,तो तेरा डर बनाये रखना,
हर दिल में एक तस्वीर, माँ की बसाये रखना।
नक़ाब हो चेहरे पे , पर रिश्ते गहरे रखना,
झूट के साये में, सच का डर जिन्दा रखना।
चलती है जिंदगी रुपयों से, रुपया जिंदगी से हावी न रखना,
बिकते जिस्म का दर्द हर दिल में गहरा रखना।

कविता

दरिया दिया और प्यासे रहे,
उम्र भर साथ अपने दिलासे रहे।
जो थे वैसा रहने न दिया,
न सोना बने, न कांसे रहे।
कब टिकती है अपने कहे पर,
ज़ुबां ए जीस्त पर झांसे रहे।
मुद्दतों कायम रहा अपना डेरा,
हम जहाँ भी रहे, अच्छे खासे रहे।
मुझमें क्या कुछ न बदला ‘वीर’,
मगर ग़ैरों के इलज़ाम बासे रहे।
सबके पास कोई मुद्दा है, हर कोई अड़ा है, जिसे देखिये.. एक हाथ की दूरी पर खड़ा है।
सभी ने तो ढूंढ लिये हैं कारोबार अपने, आप माल हैं और आप ही बाज़ार अपने।
जिस दरार ने कभी किया था बंटवारा, वो दरार ही इस दरिया का किनारा होगा।
उस छत को अब दीवार का सहारा होगा, रहे कोई भी उसमें मगर घर हमारा होगा।
फिर क्यों न उठाई जाये कलम 'वीर', जब हो गया है ज़हन में, अँधेरा बहोत।
सच आइनों में नहीं, आँखों में दिखा करता है, जो जानता है! वो कुछ भी नहीं लिखा करता है।
बदलते मौसम पर ऐतराज़ क्यों हो? जो आप ज़ाहिर है वो राज़ क्यों हो?
गर तमाशा है तो किरदार बदला जाये, कहानी बदली जाये, सार बदला जाये।
मेरी आँखों से ही देखा करो खुद को, दुनिया में नज़र बहोत हैं, परख कम।
अब मैं समझा बीती रात वो घबराहट क्या थी, वो किसकी दस्तक थी और वो आहट क्या थी।
जानने वाले सब जान कर भी अनजाने रहे, देख कर अंजाम ए दानाई, हम दीवाने रहे।
अपने ख्यालों में मगन रहता है, बेख़बर गुलों से चमन रहता है।
एक इशारे ने कलम को रोशनाई दे दी, मेरे लिखते ही इस दिल ने सफाई दे दी।
जब चले थे तब वापसी का इरादा था, अब घर जैसा लगता है रास्ता मूझको।
रात आँखों ने पी लिया अँधेरा, सहर उसका चेहरा चिराग सा था।
अब उतना ही देखना जितना पर्दा दिखाये, हम से जाती रही बेनकाब होने की अदा।
गिर भी जायेंगे, तो रास न आयेंगे, ये उड़ते बादल हैं, ये पास न आयेंगे।
जो आ गया इन आँखों में पानी बेसबब, हम मरहम किसी के घाव पर लगा देंगे।

Saturday, October 1, 2016

ऑरोविले

भारत के सभी राज्यों में किसी ना किसी राजनैतिक दल की सरकार है और धर्म भी है और सभी जगह भारतीय मुद्रा चलन में भी है, फिर आखिर भारत का ऐसा कौन सा शहर है जहाँ आपकी जेब से पैसे नदारद हों और आप चैन की सांस ले रहे हों? आप धर्म से ऊपर उठ कर जिंदगी जी रहे हों l राजनीति आपके घर में दखलंदाजी न कर रही हो l सोचिये l
चलो हम आपको बता देते है कि यह शहर दक्षिण भारत में है और चेन्नई से केवल 150 किलोमीटर की दूरी पर केंद्र शासित प्रदेश पुड्डुचेरी के विलुप्पुरम जिले में है। इस जगह का नाम है ऑरोविले, और  सूर्योदय के शहर के नाम से पूरी दुनिया में मशहूर है l इस शहर को मीरा अल्फासा (मां) ने 28 फरवरी, 1968 में श्री अरविंदो सोसाइटी प्रोजेक्ट के तहत स्थापित किया था l  इस शहर को रोजर एंगर ने डिजाइन किया था. इस शहर की स्थापना करने वाली 'मां' का मानना था कि यह यूनिवर्सल टाउनशिप भारत में बदलाव की हवा लाएगा l
ऑरोविले शहर को बसाने का सिर्फ एक ही मकसद रहा कि यहां सभी इंसान जात-पात, ऊंच-नीच और भेद-भाव के बिना रहें। यहां पर कोई भी इंसान आकर रह सकता है, लेकिन सिर्फ एक शर्त है उसको यहां पर एक सेवक की तरह रहना होगा। इस शहर में 50 देशों के लोग रह रहे हैं। इस शहर की आबादी लगभग 24 हजार लोगों की है। यहां पूरी दुनिया के पुरुष और महिलाएं शांति से रहते हैं l हर तरह की राष्ट्रीयता से ऊपर l न कोई झगड़ा-झंझट और न कोई क्षुद्र राजनीति l ऑरोविले में आपको मानवीयता का चरम बिंदु देखने को मिलेगा l

ऑरोविले के लोग धार्मिकता के बजाय आध्यात्मिकता को अधिक तरजीह देते हैं l  इस शहर के बीचोबीच एक मातृमंदिर है, हालांकि ये मंदिर किसी धर्म से जुड़ा हुआ नहीं है, और यहां पर सिर्फ लोगा योग करते हैं। यहां 900 की क्षमता वाली एक असेंबली है और यहां की आतंरिक दिक्कतों का निपटारा यहीं के लोग करते हैं l लोग एक-दूसरे की भाषा नहीं समझ पाते इसके बावजूद वे अपना सारा काम बिना रुकावट के करते हैं l यहां लोग बाहर से चीजें आयात-निर्यात करने के लिए ही पैसे का इस्तेमाल किया करते हैं l इसके अलावा यहां सभी चीजों के मूल्य न्यूनतम हैं l यहां सांसारिक सुखों को बिना वजह की तरजीह नहीं दी जाती l ऑरोविले को यूनेस्को ने एक अंतरराष्ट्रीय शहर के रूप में प्रशंसा की है और भारतीय सरकार की ओर से समर्थित भी है।


सुण रै म्हारी सखी सहेली

सुण रै म्हारी सखी सहेली, किती सुखी है आ छोटी सी चिड़कली |
जद मन करै रुंख पै आवै, जद मन करै आकास में फुर सूं उड़ जावै |
सुण रै म्हारी सखी सहेली, आज्या चालां आपां भी उड़बा बाळपणा मै |
खावां खाटा-मीठा बोरया, अर काचर-मतिरा आज्या मौज मनावां कांकड़ मै |
आज्या घर बणावां माटी का, गळीयारा में खेलां चोपड़-पासा, तिबारा में |
लै खेलां लुख -मिचणी ओ रयुं तूं लुख्ज्या म्हूँ तनै हैरुं |
किती सुखी है आ छोटी सी चिड़कली.............
न तो ब्याह की चिंता, न ही सासरै आणों-जाणों अर न ही घुंघटो पड़े काढणों |
सुण रै म्हारी सखी सहेली, चाल बाळपणा नै देवां झालो,
आज्या हिंडोळा हिंडा सावण-तिजां मै, अर पूजां ईसर-गौर, गणगौरां मै |
लै आपां गुड्डी बणावां चिरमी-चिप्ल्या की, आज ओळयूं आई पाछी ,पेल्याँ की |

पीणों, पचणों, पैरणों, सरदी साथै आय |
खाणों, रैणों खेलणों,सीयालै सुख दाय ||

अर्थात: पानी,पचना और पहनना ये सर्दी के साथ आते है | साथ ही भोजन ,रहना और खेलना ये सब शीत ऋतू में ही सुखदायी होते है |